हम सोचते हैं

महेश रौतेला

यह शहर आदमी के साथ
जीता और मरता है,
दादी कहती है
उसके ज़माने में
ऐसा-ऐसा होता था,
माँ कहती है
उसके समय में नदी यहाँ तक बहती थी,
लोग कहते हैं
उन्होंने घना जंगल देखा था,
ठेकेदार बोलता है
उसने अनगिनत अवैध कटान किया है,
बड़े सोचते हैं
उनके समय पढ़ाई अच्छी होती थी,
किसान कहता है
पहले बारिस समय से बरसती थी,
हम सोचते हैं
तब मधुर संगीत बजता था
प्यार दिखाई देता था,
और आदमी मुर्दा ही नहीं
क्रांतिकारी भी होता है।

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