थोड़ा और चलती साथ तो

15-01-2026

थोड़ा और चलती साथ तो

महेश रौतेला (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

थोड़ा और चलती साथ तो
यात्रा सहज हो जाती, 
थोड़ा और चलती साथ तो
समय आदत से कटता, 
थोड़ा और चलती साथ तो
तुम्हारी शिकायतें सुन लेता, 
कहता—
चारों धाम घूमाया
असम-मेघालय-राजस्थान
रामेश्वरम-ऊटी-आगरा-केरल-अंडमान, 
सिक्किम-उत्तराखंड-गुजरात, 
उत्तराखंड जैसा स्विट्ज़रलैंड
पेरिस-यूरोप आदि घुमाया। 
फिर कहता फिर यूरोप चलते हैं
उत्तर आता—
भारत पूरा घूम लिया क्या! 
मथुरा-वृन्दावन जाना है। 
पूरा भारत घूम लेते
हरिद्वार में फिर नहा लेते
लेकिन “फिर” नहीं आया
हाँ, वहाँ अस्थि विसर्जन होना था हुआ, 
इस लोक से उस लोक तक
आस्था का आवागमन चला। 
थोड़ा और चलती साथ तो
और हँसना-हँसाना हो जाता। 

1 टिप्पणियाँ

  • 16 Jan, 2026 07:29 PM

    भावपूर्ण रचना है। भावुकता काव्य का प्राण है।सुन्दर रचना। ----हेमन्त।

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