मेरे किए की मुझको सज़ा क्यों नहीं देते

15-03-2026

मेरे किए की मुझको सज़ा क्यों नहीं देते

सुशील यादव (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
 
मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
 
221    1221    1221    122
 
मेरे किए की मुझको सज़ा क्यों नहीं देते
इक आग सुलगती है बुझा क्यूँ नहीं देते
 
अब कौन किसे याद कभी आता है हरदम
हूँ भूलने की चीज़ भुला क्यूँ नहीं देते
 
इस शहर के हम भी अभी भटके हैं मुसाफ़िर
रहबर हैं अनेकों ये पता क्यूँ नहीं देते
 
जज़्बात पे क़ाबू हमें रखना नहीं आया
फिसलन मिरी जी भर के बढ़ा क्यूँ नहीं देते
 
पत्थर जिसे पूजा, नहीं देता कभी चाहा
मन्दिर से इसे मन के, हटा क्यूँ नहीं देते
 
पीतल की तरह मुझको हमेशा कहीं माना
सोना हूँ अगरचे मैं, तपा क्यूँ नहीं देते
 
दादागिरी चलती नहीं हरदम किसी की अब
बन्दूक चला इनको विदा क्यूँ नहीं देते
 
बस्ती अभी हर रोज़ उजाड़ी हुई मिलती
ये जान लिवा जंग मिटा क्यूँ नहीं देते

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