वो किसी उम्मीद पे मायूस सा मिलता न था

01-02-2026

वो किसी उम्मीद पे मायूस सा मिलता न था

सुशील यादव (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
 
2122    2122    2122    212
 
वो किसी उम्मीद पे मायूस सा मिलता न था
पास रहते ये हक़ीक़त हमने तो जाना न था
 
हर सदा को अनसुना सा कर दिया करता मेरी
मेरे नक़्शे पा चले ये भी ग़वारा सा न था
 
बाद जब पहचान सी होने लगी उनसे यहाँ
ज़िन्दगी भर हर किए अहसान को भूला न था
 
मेरे ही किरदार में हैं ख़ामियाँ थोड़ी बहुत
ख़ूबियों के साथ मुझको तो कहीं जीना न था
 
कुछ रज़ा मेरी नहीं थी लेने को सौग़ात की
और कोई हाथ में तक़दीर का कासा न था
 
जर्द पत्ते जब से झड़ने लग गए हैं पेड़ के
बैठना-उड़ना परिंदों का कभी होता न था
 
डर हमें लगता है अपने साए से बस आजकल
हादिसा नज़दीक से होते हुए गुज़रा न था
 
मुन्तज़िर थे हम भले यूँ चाहतो में कोई दिन
रहगुज़र तेरी कभी हमने इधर ताका न था

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