मिलते रहो यूँ ही मुझे रुसवा किए बग़ैर

01-01-2026

मिलते रहो यूँ ही मुझे रुसवा किए बग़ैर

सुशील यादव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 
221    2121    1221    212
 
मिलते रहो यूँ ही मुझे रुसवा किए बग़ैर
बाज़ार का भी लुत्फ़ है सौदा किए बग़ैर
 
हम रह नहीं सकेंगे बिना आईना के अब
टूटेंगे किस के आगे तमाशा किए बग़ैर
 
नाहक़ ही सौंप दी है ख़जाने की चाबियाँ
नादान-नासमझ पे भरोसा किए बग़ैर
 
उल्फ़त तुझे सिखाने नहीं आएगा कोई
इस शय को सीख लो जी बुढ़ापा किए बग़ैर
 
राहत है कुछ लिबास में हैं आदमी यहाँ
कल तक यहाँ के लोग थे पर्दा किए बग़ैर
 

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