घर के बिखरे हुए हालात पे रोना आया

01-01-2026

घर के बिखरे हुए हालात पे रोना आया

सुशील यादव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
 
2122    1122    1122    22
 
घर के बिखरे हुए हालात पे रोना आया
ज़िक्र जब छेड़ दी हर  बात  पे रोना आया
 
हम यही  समझे थे हमको ही नहीं आता कुछ
देखे दुनिया  तो सवालात पे रोना आया
 
ले के निकले थे  कहीं  छाते कहीं  बरसाती
आज  बरसे  नहीं  बरसात पे रोना आया
 
इस फिज़ा  गोया जहर सा घुला अब लगता है
कुछ तुम्हारे उड़े  जज़्बात  पे रोना आया
 
हम भी  बदनाम हुए जाते थे तेरी चाहत
कल की सोचे कहीं, औक़ात पे रोना आया
 

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