तमाम हम हदें औ दायरा समझते हैं

15-12-2025

तमाम हम हदें औ दायरा समझते हैं

सुशील यादव (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)


मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212    1122    1212    22
 
तमाम हम हदें औ दायरा समझते हैं
अगर कहो भी नहीं मशवरा समझते हैं
 
मिरी समझ में जो आती नहीं समझते हैं
उड़ी-उड़ी रंगतें हर दफ़ा समझते हैं
 
जो मन-पसन्द कभी आईना बना लो तुम
ये लोग फ़र्क़ असल आईना समझते हैं
 
जो रूठ के गई हो तुम बुझे हुए मन से
कि लोग कब इसे ही रूठना समझते हैं
 
बढ़ी हुई मिरी दीवानगी कभी देखो
हकीम मर्ज़ को बेइंतिहा समझते हैं
 
तिरी गली की मैं गर्दिश में रोज़ रहता हूँ
मुझे बे हाल कहीं शर्तिया समझते हैं
 
मैं नासमझ कहीं बस्ती में अब अकेला हूँ
क़रीब आ के वो क़ीमत जुदा समझते हैं

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