हर अक्स  आईने का सजाना पड़ा मुझे

01-06-2026

हर अक्स  आईने का सजाना पड़ा मुझे

सुशील यादव (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 
221    2121    1221    212
 
हर अक्स  आईने का सजाना पड़ा मुझे
इस रख रखाव ख़र्चा उठाना पड़ा मुझे
 
बेनाम    ख़ानदान से आया  हुआ भले
बस  अहमियत  ज़रूरी बताना पड़ा मुझे
 
शुहरत से मेरी तुम  कभी वाक़िफ़ नहीं रहे
तब जा के हैसियत को गिनाना  पड़ा मुझे
 
परचम  बग़ावतों का पड़ौसी उठा रहा
शर्मिंदगी में सर वहीं झुकना पड़ा मुझे
 
उल्फ़त में आपकी  मेरा दिल रोए जा रहा
वादों  की आड़  ले के  मनाना  पड़ा मुझे
 
मैंने बनाए लाख बहाने भी इश्क़ में
भारी वही तमाम  बहाना पड़ा मुझे
 
ये आग  दिल के कोने में कब से सुलग रही
आँसू  के टेंकरों से बुझाना पड़ा मुझे

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