हमपे कभी गुज़री वो हिकायत  न कहेंगे

01-06-2026

हमपे कभी गुज़री वो हिकायत  न कहेंगे

सुशील यादव (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
 
221    1221    1221    122
 
हमपे कभी गुज़री वो हिकायत  न कहेंगे
राहों मिली दुश्वारी शिकायत न कहेंगे
 
जो तोड़ दिया तमने मिरे दिल का किनारा
इसको तिरी चाहत की ज़रूरत न कहेंगे
 
झुकना हमें आया ही नहीं राहे वफ़ा में
क़दमों को हटा लेने को रुख़्सत न कहेंगे
 
बेकार लगा बैठे ये दिल माहे-जबी पर
वो ईद हुई रहती है उल्फ़त न कहेंगे
 
बातें कभी उनको तो बनाना नहीं आया
झूठों के बहाने वो हक़ीक़त न कहेंगे
 
भूतों का बुलावा है मुझे जाना पड़ेगा
बाँहों में तुझे लेने की हिम्मत न कहेंगे
 
तू जो चले मेरे किसी नक़्शे पा के जैसे
आसान सी हरकत को यूँ आदत न कहेंगे

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