इतने भीगे हम भी तनहा यादों की बरसात में

15-02-2026

इतने भीगे हम भी तनहा यादों की बरसात में

सुशील यादव (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

रमल मुसम्मन महज़ूफ़
 
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
 
2122    2122    2122    212
 
इतने भीगे हम भी तनहा यादों की बरसात में
वो ही छोटी कुटिया अपनी वैसे ही हालात में
 
कौन आजीवन हमें दे आदमी की ज़िन्दगी
नर्क की कुछ यातना पाने लगे जज़्बात में
 
बस सज़ा सी बनती जाती दुःख की दीवारें बड़ी
लाँघ पाते हम कहाँ रिश्ते उसी औक़ात में
 
पेड़ की छाया में हमने, तब बिताये बचपने
अब उन्हें ही काटने, बैठे रहे हैं घात में
 
छीन लेता कोई तुमसे जब ख़ज़ाना प्यार का
कुछ विकल्पों रोने सा रखते कभी तुम हाथ में
 
हम तनावों में रहा करते हैं ज़्यादा ही कहीं
कुछ पलों की दूरियाँ ढोते रहे सौग़ात में
 
घर का भेदी जब से लंका को ढहाने में गया
हम कलायें धोखा देने सीख लें अनपात में

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