चाहत को दिल में रोज़ छुपाने से क्या मिला

01-01-2026

चाहत को दिल में रोज़ छुपाने से क्या मिला

सुशील यादव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 
221    2121    1221    212
 
चाहत को दिल में रोज़ छुपाने से क्या मिला
दिल को तमाम रात  जलाने से क्या मिला
 
ये फैसला  लिया कभी ज़िद में न जाने क्यों
रुसवाई हर सूं मेरी कराने से क्या मिला
 
हम मुंतजर से राह  तका करते थे वहीं
उस  मोड़  पर कभी  नहीं आने से क्या मिला
 
रखता हूँ देख भाल से तुझको ऐ ज़िंदगी
दिल औ जिगर मिरा ही  सताने से क्या मिला
 
गंगा  नहाने की हमें ख्वाहिश कभी रही
सरकार मेरी लुटिया डुबाने से क्या मिला
 
खामोश मैं  सदा  दिया करता सुकून  को
मेरा भरोसा  ही लुटे जाने से क्या मिला
 
तन्हाइयो  में अश्क बहाते  हो भाई तुम
हंगामा कर के देख  ज़माने से क्या मिला
 

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