कोई मजबूरियों झुकता हुआ गुज़रा कैसे

01-01-2026

कोई मजबूरियों झुकता हुआ गुज़रा कैसे

सुशील यादव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

2122    1122    1122    22
 
कोई मजबूरियों झुकता हुआ गुज़रा कैसे
कम कहीं आमदनी ने उसे तोड़ा कैसे
 
वो गिरेबाँ कभी ना झाँक के देखा होगा
फिर उसे क्या पता जीने का तरीक़ा कैसे
 
मुख-बिरी का कहीं से शौक़ लगा है उसको
वर्ना वो पालता अपना बड़ा कुनबा कैसे
 
रंज ख़ुश्बू से औ परहेज़ उसे फूलों का
फिर लगाता कहीं यादों में बग़ीचा कैसे
 
हम उसूलों पे सही चलते रहे हरदम ही
बस इसी बात से ज़्यादा रहे ज़िंदा कैसे
 
मैं भी उस पार उतर जाता हूँ अपने दम पर
रोकता कैसे हमें देखे ये दरिया कैसे
 
तुम ना घेरो यूँ सवालों में उसे ज़्यादा भी
आपे बाहर है अभी आग-बबूला कैसे
 

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