वंश

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सरकारी अस्पताल के बरामदे में क़रीब साठ-पैंसठ साल की एक बुढ़िया बड़ी ही बेचैनी से टहल रही थी, पर उसका सारा ध्यान प्रसव गृह के दरवाज़े की तरफ़ ही था। भीतर से जब भी प्रसूता की चीख़ सुनाई देती तो वह बुढ़िया बड़बड़ाने लगती। 

तभी प्रसव गृह का दरवाज़ा खुला। एक नर्स बाहर आई। मुस्कुराते हुए बोली, “दादी जी बधाई हो, लड़की हुई है।”

“लड़की हुई है” . . .कहते हुए बुढ़िया का चेहरा उतर गया। बुढ़िया पास में पड़ी बेंच पर बैठ गई। तभी उसका लड़का आ गया, जो बाज़ार गया था, कुछ ज़रूरी सामान लेने। 

अपनी माँ को मायूस बैठा देख वह समझ गया कि इस बार भी लड़की हुई है। तभी बुढ़िया बुदबुदायी, “बेटा इस बार भी वंश आगे न बढ़ पाया। यह चौथी कलमुँही पैदा हो गई . . .” 

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