हिंदी

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


माँ के आँचल सी पावन हिंदी 
आँगन में तुलसी सी महके हिंदी। 
 
गंगा की निर्मल धारा सी बहती हिंदी 
दादी माँ की मीठी लोरी सी हिंदी। 
 
भारत भू के माथे पर सजी हिंदी 
जन-जन के हृदय में बसी हिंदी। 
 
मीरा के भजन सी मधुर हिंदी 
प्रेमचंद की कथा-व्यथा कहती हिंदी। 
 
आज हमारी अमिट पहचान बनी हिंदी 
आओ राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाएँ हिंदी। 
 
लाल क़िले से दहाड़ती शेरनी सी हिंदी 
देश-दुनियाँ में परचम लहराती हिंदी। 
 
खेतों में खलिहानों में चहकती हिंदी 
नगरों में महानगरों में बुलंद होती हिंदी। 
 
कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्यारी हिंदी 
हैं हम बहुभाषी, एकसूत्र में पिरोती हिंदी। 
 
आओ सब जन मिल गुणगान करें हिंदी 
सब मतभेद भूल, मान बढ़ाएँ हिंदी।

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