ख़्वाहिशें 

15-09-2026

ख़्वाहिशें 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

अपने ही लगने लगे अजनबी से मुझे 
ना मुहब्बत रही, ना आशा रही उनसे मुझे। 
 
ख़ुद ही ख़ुद से बातें करने लगा मैं पागल 
किसी से कोई वास्ता न रहा जब से मुझे। 
 
मेरे आँसुओं क़ीमत न समझी किसी ने 
मेरे अपनों ने ही मारा धीमे ज़हर से मुझे। 
 
मुश्किलें हौसलों की बड़ी वजह बन गईं
अब रास्ता पूछने की ज़रूरत नहीं किसी से मुझे। 
 
ख़त्म जीने की जब हो गईं ख़्वाहिशें 
एक वजह मिल गई जीने की कविता से मुझे। 
 
ज़माने का क्या, ज़माना तो हवा के पीछे चलता है
मनमौजी हूँ, ग़म क्या ख़ाक दूर करेगा मुस्कान से मुझे। 
 
अपने आँसुओं का क़तरा-क़तरा बहाकर बैठा हूँ 
अब कोई उम्मीद नहीं निष्ठुर ज़माने से मुझे। 
 

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