दिमाग़ 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मेरे गाँव के लोगों में 
दिमाग़ बहुत है 
वे क्षण-क्षण दिमाग़ से काम लेते हैं 
खेत की मेड़ 
कब-कैसे काटनी है 
ख़ूब अच्छे से जानते हैं। 
 
कब और कैसे 
पैसा खाना है और पचाना है 
कब और किस स्थिति में 
एफआईआर दर्ज कराकर 
समझौते के नाम पर नोट छापने हैं
मेरे गाँव के लोग ख़ूब जानते हैं, 
पहचानते हैं 
क्योंकि मेरे गाँव के लोगों में दिमाग़ बहुत है। 
 
दुश्मन को बाप बना लेते हैं 
और दोस्त को धूल चटा देते हैं 
अपनों का काटकर गला 
सरकारी बाबूओं के तलवे चाटते हैं 
क्योंकि मेरे गाँव के लोगों में दिमाग़ बहुत है। 
 
कब, कैसे, किसका होगा भला 
यह नहीं जानते 
पर मेरे गाँव के लोगों में दिमाग़ बहुत है। 

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