कुमाता 

15-09-2026

कुमाता 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

पता नहीं किसने कहा था कि “पूत कपूत हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती।”

अख़बार उलटते-पलटते उसके मस्तिष्क में यह बात तब आई जब उसने एक ताज़ी घटना पढ़ी कि कैसे एक माँ ने अपनी बेटी को थोड़े धन के लिए बेच दिया। यह तो आजकल की आम बात है। यह सोचकर वह फिर से अख़बार उलटने-पलटने लगा, तभी उसके मस्तिष्क में एक पुरानी घटना ताज़ा हो गई। कैसे उसकी स्वयं की माँ ने पुश्तैनी जायदाद से उसे वंचित कर दिया। बल्कि उसने बड़े बेटे होने का पूरा-पूरा फ़र्ज़ निभाया। जब उसके स्वयं के भाई दुधमुँहे थे तब बाप के साथ मिलकर मेहनत मज़दूरी करके घर की माली हालत सुधारी और स्वयं के भविष्य की चिंता न करके अपनी माँ व छोटे भाइयों पर ध्यान दिया। जब छोटे भाई जवान हुए तो उसी माँ ने उन्हें भड़काया और सबने मिलकर उसे पीट-पाटकर अलग कर दिया। सारी संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लिया। उसका स्वयं का बाप मूक दर्शक बना रहा। कुल मिलाकर मौन स्वीकृति। 

संसार के झूठे रिश्तों के बारे में सोचकर उसका हृदय सिहर उठा . . .

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
कविता
नज़्म
बाल साहित्य कविता
किशोर साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
कविता - हाइकु
चिन्तन
काम की बात
यात्रा वृत्तांत
ऐतिहासिक
कविता-मुक्तक
सांस्कृतिक आलेख
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में