शोक

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जब शोक हृदय में बैठ जाता है 
चेहरा मुरझा जाता है 
मन अति विह्वल हो जाता है 
लेकिन इस शोक से लड़ना पड़ता है 
लड़-लड़कर जीना पड़ता है। 
 
है सत्य मृत्यु 
सच कह गया कहने वाला 
बच सका न आज तक कोई 
फिर मृत्यु शोक करना ही क्यों 
है कौन प्राणी जगत में ऐसा 
जिसका मृत्यु से पड़ा न पाला। 
 
भ्रमवश झूठ को जब सच समझा जाता है 
ईश्वर से विश्वास डगमगा जाता है 
कुछ जाने-अनजाने पाप उदय हो जाते हैं 
आत्मा पर अंधकार का पर्दा गिर जाता है 
मन अंधकारमय हो जाता है 
तब शोक हृदय में छा जाता है। 
 
राम-कृष्ण, गौतम-रहीम सबने सही मृत्यु 
जग को दिया बोध बुद्ध ने 
जो आया है वो जाएगा 
नित्यानित्य ज्ञान ही है 
आत्मज्ञान और शोक मुक्ति का उपाय। 

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