बसंत 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

चहुँ ओर हरीतिमा छाई, 
प्रकृति दुलहन बन आई। 
 
आया बसंत-छाया बसंत, 
ऋतु ऐसी, गुम हुआ संत। 
 
महक रही कली-कली, 
कोयल घोली मिश्री की डली। 
 
मन बेचारा है बौराया, 
ऋतुराज बसंत है आया। 
 
निर्मल-कोमल पत्ते-फूल, 
हृदय में चुभता प्रेमशूल। 
 
भॅंवरे-तितली सुंदर-सुंदर, 
छेड़ रहे अद्भुत स्वर। 
 
झर-झर झरनों का संगीत, 
आँखों से हृदय तक प्रीत। 
 
प्रेम प्रकृति का है स्वभाव, 
रे मानव! तू मत खा भाव। 

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