कवि

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

कवि बनना सरल नहीं है 
क़लम कॅंपकपाती है 
मन छटपटाता है 
आत्मविश्वास लड़खड़ाता है 
रातों की नींद चली जाती है 
तब कोई कवि बन पाता है . . .।
 
ज़माने भर की व्यथा सहनी पड़ती है 
सदियों शब्द साधना करनी पड़ती है 
संसार का सुख-दुःख सहना पड़ता है 
सौ बात की एक बात पागल होना पड़ता है 
तब कोई कवि बन पाता है . . .। 
 
जब जग हँसता है तब रोना पड़ता है 
मन चाहे पुष्पों को छोड़, काँटों को चुनना पड़ता है 
पग-पग पर संग्राम महान करना पड़ता है 
हृदय होता है छलनी और सृजन करना पड़ता है
तब कोई कवि बन पाता है . . .। 

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