बिकाऊ साहित्यकार 

01-03-2026

बिकाऊ साहित्यकार 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मैं 
बिकाऊ साहित्यकार हूँ साहब 
कभी था टिकाऊ 
पर अब नहीं . . . 
चिल्लर में ख़रीद लो मुझे 
मैं ग़रीबी में पला-बढ़ा 
हौसलों से साहित्यकार बना
जन्म से लेकर 
अब मृत्यु तक 
ग़रीब साहित्यकार बनकर मरना नहीं चाहता। 
 
मैं बिकाऊ हूँ साहब 
आटा, नमक, तेल, मसाला 
सबका हिसाब रखता हूँ 
परन्तु इनकी ख़रीद का भुगतान नहीं कर पाता हूँ
कभी समाज का बड़ा हितचिंतक था मैं 
राष्ट्र के लिए जिया और राष्ट्र के लिए लिखा 
पर अब उस लिखे हुए का कोई मूल्य नहीं 
मैं पीछे रह गया 
और मेरी ग़रीबी आगे निकल गई . . . 
मैं बिकाऊ साहित्यकार हूँ साहब 
कोई दो ख़रीद लो मुझे? 

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