आजकल का युवा 

15-05-2026

आजकल का युवा 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

आजकल का युवा 
तनावग्रस्त होकर 
खीज और कुढ़न में जी रहा है। 
 
फ़ैशन परस्ती में फँसकर 
सिर के बालों में नये-नये आकार दे रहा है 
कानों में बाली, हाथों में कड़ा डाले
और मुँह में गुटखा दबाये 
भविष्य की परवाह किये बग़ैर 
फोन स्क्रीन पर रील बस रील देख रहा है। 
 
आजकल के युवा को 
न देश की चिंता
न समाज की चिंता
न स्वयं के भविष्य की चिंता 
बहुत ही भयावह स्थिति में जी रहा है 
आज का युवा। 
 
जीवन निर्माण महत्त्वपूर्ण है 
जाग युवा—
आदर्श दिनचर्या अपना कर 
सही समय पर सोना और जागना, 
व्यायाम, आसन, प्राणायाम, सैर, 
स्वास्थ्यवर्धक भोजन कल्याणकारी है 
देश, समाज और स्वयं के लिए। 

1 टिप्पणियाँ

  • 31 May, 2026 12:28 PM

    कवि महोदय, ​आपकी कविता में युवा पीढ़ी के भटकाव, गुटखे की लत और रील्स में समय गंवाने की चिंता तो जायज है, लेकिन इस भटकाव को 'हाथ के कड़े' और 'कान की बाली' से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है। परंपरा को फैशन न कहो, यह तो सदियों की थाती है, हाथ का कड़ा और कान की बाली, इतिहास की याद दिलाती है। ​कवि! भटकाव पर चोट करो, गुटखे और रील्स को ज़रूर कोसो, पर सभ्य संस्कृति के इन प्रतीकों को, कुढ़न के साथ मत परोसो। ​तनाव भी है, संघर्ष भी है, पर युवा आज भी लड़ रहा है, इन्हीं कड़े वाले हाथों से, वह देश का भविष्य गढ़ रहा है। पहनावे से मत नापो तुम, अंतर्मन की गहराई को, बदलो अपनी इस संकुचित, रूढ़िवादी परछाई को।

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