जहाँ में आग है लगी, धुआँ बना ग़ुबार है

01-04-2026

जहाँ में आग है लगी, धुआँ बना ग़ुबार है

सुशील यादव (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हज़ज मुसम्मन मक़बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
 
1212    1212    1212    1212
 
जहाँ में आग है लगी, धुआँ बना ग़ुबार है
तमाम ख़्वाहिशें मिरी लो आज दर किनार है
 
मिरी तलाश एक हम-सफर की बस दबी रही
मिरे ही आईने का टूटना तो बार-बार है
 
वो तल्ख़ बात पर यक़ीन रख रहा है अब तलक
मिरी गुजारिशों चमकता उसका कार-बार है
 
है वक़्त बे-र'हम न जाने कितने दिल को तोड़ता
कहीं बना मिसाल है, कहीं पे यादगार है
 
शजर ये सूखने लगे, बिना ही देख भाल के
मगर वहीं है चाँदनी, जहाँ नज़र बहार है
 
ये आदमी वो आदमी ये ज़िन्दगी वो ज़िन्दगी
दिशा-दिशा में शोर है, ये क़ौम होशियार है
 
है नींद में जो आदमी उसे जगा सको अगर
ये लोक तंत्र नींव है, ये पीढ़ियों क़रार है 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल
कविता-मुक्तक
सजल
नज़्म
कविता
गीत-नवगीत
दोहे
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
पुस्तक समीक्षा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में

लेखक की पुस्तकें