आस अभी बाक़ी है 

01-04-2025

आस अभी बाक़ी है 

राजेश ’ललित’ (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

यूँ ही 
गाहे बगाहे
गुज़र जाता हूँ 
उस गली से, 
अक्सर निगाह, 
उठ जाती है 
उस दरवाज़े की ओर, 
अब भी ललक, 
मन में है, 
शायद दरवाज़े पर, 
तुम दिख जाओ, 
आस अभी बाक़ी है, 
दिल में उठी हूक अभी बाक़ी है, 
 
सुना है 
वह घर अब बिक
गया है, 
दरवाज़ा भी नया लग गया है, 
पर निगाह 
अब भी उठ जाती है, 
जब भी गुज़रता हूँ, 
उधर से, 
आस अभी बाक़ी है, 
अनायास उठती, 
उच्छवास अभी बाक़ी है, 
जीवन की टिमटिमाती लौ में, 
अभी तेल नहीं बचा है, 
पर गुज़रना 
अभी बाक़ी है। 

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