सुख की चाबी मत ढूँढ़ो, ताला किसी ने लगाया ही नहीं
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
भगवान ने भक्त से कहा, “जा, अपने दुखों से भरा मटका उस जगह रख आओ जहाँ मैं बताऊँ और बदले में वहाँ पड़े दूसरों के दुखों से भरे मटकों में से कोई एक उठा लाना। उस मटके के दुख अब तुम्हारे होंगे।”
अपने आप को सबसे अधिक दुखी मानने वाला एक व्यक्ति भगवान से दुखों से मुक्ति पाने के लिए गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करता था। उसके व्यापार में विशेष बरकत नहीं थी। बेटी की ससुराल में निभी नहीं, इसलिए वह घर लौट आई थी। बेटे को वर्तमान व्यवसाय में रुचि नहीं थी, वह कुछ और करना चाहता था, पर उसमें भी वह जम नहीं पा रहा था। पत्नी अक्सर बीमार रहती थी। इन परिस्थितियों के बीच आर्थिक स्थिति भी संतोषजनक नहीं थी।
अब वह और अधिक धार्मिक हो गया था। परेशानियों से बाहर निकलने के लिए दूर स्थित मंदिर तक पैदल दर्शन करने जाता, उपवास करता और सुबह-सुबह ध्यान में बैठ जाता। ऐसा दो वर्षों तक चलता रहा। अंततः भगवान प्रसन्न हुए।
भगवान ने कहा, “मैं तेरी तपस्या का कारण जानता हूँ। मैं तेरे दुखों की सूची एक मटके में रख देता हूँ। मैं तुझे पूरी तरह दुख मुक्त तो नहीं कर सकता, क्योंकि जो नियति में है, उससे गुज़रना ही पड़ता है। लेकिन तेरी भक्ति से प्रभावित होकर मैं तेरे लिए एक राहत का मार्ग बना सकता हूँ। जिस मंदिर में तू जाता है, वहाँ एक पीपल का पेड़ है। वहाँ सैकड़ों बंद मटके दिखाई देंगे। दरअसल लोग अपने दुख कम हों, इस आशा से अपने दुख उस मटके में रखकर पीपल के पास रख आते हैं। उन्हें विश्वास है कि इस तरह अपने दुख मुझे अर्पित करने से वे कम हो जाते हैं।
तेरे लिए राहत यह है कि तू अपना दुखों से भरा मटका वहाँ रख आ, लेकिन एक शर्त है, वहाँ से तुझे कोई एक मटका अवश्य लाना होगा। तुझे लगता है कि तू दुनिया का सबसे बदक़िस्मत है, इसलिए तू अपना मटका रखकर अपनी पसंद का कोई भी मटका उठा लाना। पर हाँ, उस मटके में क्या-क्या दुख हैं, यह जानने का अधिकार तुझे नहीं होगा। मटका ऊपर से कसकर कपड़े से बँधा होगा।”
भगवान की यह बात सुनकर वह व्यक्ति ख़ुश हो गया। उसे लगा कि उसके दुख चले जाएँगे और किसी और का मटका लेने से बोझ हल्का होगा।
अगले दिन उसे अपना मटका रखकर किसी और का मटका लेना था। लेकिन शाम ढलते-ढलते उसकी बेचैनी बढ़ने लगी। रात बीतती गई, आधी रात भी गुज़र गई, पर उसे नींद नहीं आई। वह करवटें बदलता रहा। मन में यही विचार चलता रहा कि अगर वह अपना मटका रखकर किसी और का मटका ले आया और उसमें उससे भी अधिक, असहनीय दुख हुए तो? उसका जैसा भी व्यापार है, वह उसे और उसके परिवार को दो वक़्त की रोटी तो देता है। त्योहारों पर मिठाई भी खा लेते हैं। बेटी शादी होकर लौट आई है तो क्या हुआ—सम्मान से, समाज की परवाह किए बिना उसे रखेगा। वह संस्कारी है, अगर वह पुनर्विवाह के लिए तैयार होगी तो उसके लिए भी हिम्मत जुटाऊँगा। बेटा दूसरा व्यवसाय चाहे तो वह उस पर अपना ही धंधा नहीं थोपेगा। असफलता के अनुभव से वह निखरेगा। वह न तो व्यसनों में है, न ग़लत रास्ते पर। और पत्नी, उसे बीमारी के मुक़ाबले आत्मबल विकसित करने के लिए तैयार करेगा, इलाज कराएगा। लोगों को तो कितनी असाध्य और पीड़ादायक बीमारियाँ झेलनी पड़ती हैं। वह अपने व्यापार में समय के अनुसार बदलाव लाने का प्रयास करेगा, नई पीढ़ी के बच्चों की राय लेगा। लेकिन वह अपने दुखों का मटका नहीं बदलेगा। संसार में तो अनगिनत प्रकार के दुख हैं। पहली नज़र में लगता है कि दूसरे उससे अधिक सुखी हैं, पर वास्तविकता में दुख बदलने पर पता चलता है कि बाहर से सुखी दिखने वाला व्यक्ति ख़ुद को उससे भी अधिक दुखी मानता है।
यहाँ भगवान ने शर्त रखी थी कि मटके के भीतर के दुख देखे नहीं जा सकते और किसी और का मटका लेकर अपना वहाँ रखना होगा।
पूरी रात वह सो नहीं सका। उसे यह डर सताने लगा कि कहीं दूसरे का मटका असहनीय और कभी न छूटने वाले दुखों से भरा हुआ न हो, जिससे उसका और उसके परिवार का जीवन ही बरबाद हो जाए। उसने मन ही मन तय कर लिया कि मटका नहीं बदलेगा।
अगले दिन भगवान प्रकट हुए और पूछा, “तू मटका बदलने क्यों नहीं गया?”
उस व्यक्ति ने कहा, “नहीं भगवान, मैं जैसा हूँ, वैसा ही ठीक हूँ। मैंने अपने से भी बड़े दुखों की कल्पना की और डर गया। पूरी रात सो नहीं पाया। मैं अपने दुख कम करने का प्रयास करता रहूँगा। और जो परिस्थितियाँ बदली नहीं जा सकतीं, उन्हें स्वीकार करके उनसे गुज़रूँगा। सुख-दुख काफ़ी हद तक मन, उसकी समझ और दृष्टिकोण पर निर्भर करते हैं।”
इस प्रेरक कथा का मर्म इस साल में हम सभी के मन की शान्ति के लिए समझना आवश्यक है।
आमतौर पर कहा जाता है कि दुनिया में सभी मरीज़ हैं और हर कोई दूसरे का दुख बदलना चाहता है। घुटनों के असहनीय दर्द वाला व्यक्ति सोचता है कि कंधे की मांसपेशियों का दर्द बेहतर है। पेट के किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति कहता है कि डायबिटीज़ ठीक है, मीठा कम खाकर और गोली लेकर बिना दर्द के दिन तो गुज़र सकता है। किडनी का रोगी जब किसी युवा की हृदयाघात से अचानक मृत्यु की ख़बर सुनता है तो उसे लगता है कि किडनी की बीमारी कम से कम ‘जान है तो जहान है’ की आशा तो देती है।
हम सब संसार रोगी हैं। हमें दूसरों की स्थिति अपनी तुलना में अधिक सुखद लगती है। इसी कारण हम निराशा में ‘भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों?’ कहते रहते हैं या फिर दूसरों का सुख देख नहीं पाते और ईर्ष्या-द्वेष में जीवन बिताते हैं।
यदि हम आसपास देखें तो परिचित-अपरिचित लोगों में ऐसे कई मिलेंगे जिनकी तुलना में हमारे सम्बन्ध, परिस्थितियाँ, बीमारी या आर्थिक स्थिति कम दुखद या अधिक सुखद लग सकती है। पर समस्या यह है कि हम हमेशा उन पर नज़र रखते हैं, जो भौतिक या स्वास्थ्य की दृष्टि से हमसे आगे हैं।
भले ही आपके पास छोटी कार हो, पर धूप या भारी बारिश में स्कूटर या साइकिल पर जाने वालों के बारे में सोचने के बजाय आपको बड़ी और महँगी कार न होने का ही मलाल रहता है।
कार में पति-पत्नी झगड़ रहे हों और बग़ल से मोटरसाइकिल पर पति-पत्नी अपने बच्चों के साथ हँसी-मज़ाक करते हुए निकल जाएँ, तो आपकी आलीशान कार को भी उस मोटरसाइकिल से ईर्ष्या हो सकती है।
नींद की गोली लेने मेडिकल स्टोर जाते समय सड़क किनारे ठेले पर सिर पर धूप ओढ़े मज़दूर को गहरी नींद में सोते देख सकते हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि जिनके पास सुख के सभी साधन होते हैं, वे भी सुख का अनुभव नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी नज़र हमेशा उनसे आगे वालों पर टिकी रहती है।
और अंत में, एक महिला नामी स्टोर में साड़ी ख़रीदने गई। दुकानदार ने एक-एक करके तरह-तरह की साड़ियाँ दिखाईं। महिला हर साड़ी को नकारती रही, यह भी नहीं। साड़ियों का बड़ा ढेर लग गया। थककर दुकानदार ने पूछा, “बहन, आख़िर आपको कैसी साड़ी चाहिए?”
महिला बाहर निकलते हुए बोली, “जैसी मेरी सहेली ने किटी पार्टी में पहनी थी, वैसी।”
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