ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें

15-12-2025

ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

 

“विरासत तो वारिसों को मिलती है और वारिस उसका जतन करते हैं। पिछले राजाओं से मिली इस विरासत का राजा सिंह ने भी ख़ूब ध्यान रखा है।” 

“देखा? ये राजा सिंह का सुशासन है। अब तो हमारे त्योहार भी मूल्यवान बन गए हैं।” 

‘जंगल न्यूज़’ ऐप का नोटिफ़िकेशन देखकर भक्त शिरोमणि कार्यकर्ता भेड़ाभाई घासफूसिया ने सोशल मीडिया पर स्क्रीनशाट साझा किया। समाचार में लिखा था, “जंगल की संस्कृति का डंका बजा। दिवाली का त्योहार अमूर्त विरासत में शामिल हुआ। राजा सिंह के शासनकाल में जंगल की एक और सांस्कृतिक पहचान को सम्मान मिला।” 

भेड़ाभाई की पोस्ट पर कमेंट्स की बारिश होने लगी। सिंह की पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने जश्न मनाते हुए लिखा, “वंदे जंगलम् . . . राजा सिंह की जय हो।”

स्वघोषित विद्वान होला हठीला ने तो एक घंटे में लंबी-चौड़ी पोस्ट लिख डाली। राजा सिंह के आने के बाद जंगल की कितनी विरासतें अमूर्त वारसा सूची में शामिल हुईं, इसका विस्तार से वर्णन करके उसने राजा सिंह को नई उपमा दी, “विरासत नर।”

सिंह समर्थकों ने विरासत नर के साथ दर्जनों पोस्ट डाल दीं। सभी जंगलों में हमारा जंगल श्रेष्ठ तो पहले से ही था, लेकिन पिछले राजा इस श्रेष्ठता को सिद्ध करने में बेपरवाह थे। राजा सिंह के विज़न से जंगल के त्योहारों, रीतिरिवाज़ों, पूजापाठ, मेलों, व्यायामों और भजनों को अब विश्वभर में एक अलग पहचान मिली है, ऐसा लिखते हुए जंगल का सोशल मीडिया उमड़ पड़ा। 

राजा सिंह ने भी पोस्ट की, “मेरे प्यारे जंगलवासियो, दिवाली अब केवल हमारी नहीं रही, वह वैश्विक बन गई है। दुनिया भर के जंगलों में हमारे इस त्योहार का सम्मान हुआ है, यह मेरे लिए गौरव की बात है। वंदे जंगलम् . . . जंगल माता की जय।”

अमूर्त विरासत की बात से पूरे जंगल में उत्सव जैसा माहौल था। ‘जंगल न्यूज़’ में विशेष कार्यक्रम रखा गया। उसमें राजा सिंह की योजनाओं के नाम गढ़ने वाला कलकलिया कलमघसू, राजा सिंह की प्रशंसा में कविताएँ लिखने वाला घुवड़ घाटापाडू, स्वघोषित विद्वान होला हठीलो, भक्त शिरोमणि कार्यकर्ता भेड़ा घासफूसियो आदि की पैनल ने ‘जंगल की अमूर्त विरासतों’ को वैश्विक ब्रांड बनाने के राजा सिंह के विज़न की जमकर तारीफ़ की। 

जब पूरा जंगल जश्न मना रहा था, तभी कुछ जंगलवासियों ने अलग मत रखा। कलाकार मस्तराम मोर ने लिखा, “जंगल के त्योहारों का अमूर्त विरासत बनना राजा सिंह के सुशासन में अद्भुत बात है, लेकिन मेरे विचार में जंगल की कुछ और चीज़ें भी अमूर्त विरासत बनने की दावेदार हैं, जैसे बेरोज़गारी, ग़रीबी, असमानता . . . ” 

मोर की इस पोस्ट का ज़बरदस्त विरोध हुआ। भेड़ाभाई ने सभी समर्थकों से अपील की कि मस्तराम की इस गुस्ताख़ी का जवाब दो। फिर मस्तराम की पोस्ट पर ‘जंगलद्रोही’, ‘सिंहद्वेषी’, ‘जंगल-विरोधी’ जैसे कमेंट्स का अंबार लग गया। 

राजा सिंह के कट्टर समर्थक बकुलेश बैल और पाडाकुमार पंचातिया ने तो धमकी भी दे डाली, “जंगल में रहना है तो सीमा में रह, नहीं तो पंख नोंच देंगे, समझा?” 

मस्तराम को चारों तरफ़ से घिरता देख, उसके मित्र कबूतर कानाफूसिया ने वह पोस्ट शेयर कर लिखा, “मैं मित्र मोर की बात से सहमत हूँ। विषय को थोड़ा साफ़ कर दूँ, अमूर्त का अंग्रेज़ी में मतलब ‘Intangible’ होता है। दोनों का अर्थ है, जिसे छुआ न जा सके, पर महसूस किया जा सके। रस्में दिखाई देती हैं, पर छू नहीं सकते। त्योहार मनाते हैं, पर टच नहीं कर सकते। 

“अब मोर की बात करूँ, जंगल में बेरोज़गारी, ग़रीबी, असमानता है, उसे हम महसूस कर सकते हैं, पर छू नहीं सकते। समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं। 

“मोर ने सूची अधूरी छोड़ी है, मैं उसमें जोड़ूँगा कि महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार, हिंसा आदि को भी सरकार को ‘विरासत’ घोषित कर देना चाहिए।” 

इन दोनों पोस्टों का विरोध और तेज़ हुआ। कलकलिया कलमघसू ने लिखा, “ये सब तो पहले के राजाओं के समय भी था। इसमें राजा सिंह का क्या दोष?” 

कबूतर ने जवाब दिया, “मैंने कहाँ लिखा कि ये राजा सिंह की वजह से पैदा हुआ है? विरासत वही कहलाती है, जो परंपरागत रूप से मिलती है और वारिस उसका जतन करते हैं। पिछले राजाओं से मिली यह विरासत, राजा सिंह ने भी सँभाल कर रखी है। इसके लिए तो उनका सम्मान होना चाहिए।” 

इस दलील को कॉपी कर मस्तराम मोर ने नई पोस्ट डाली और राजा सिंह को इन ‘अद्भुत’ विरासतों को सँभालने का श्रेय देते हुए एक नया हैशटैग दिया—विरासत नर . . . दो दिन बाद सुरक्षा अधिकारी बब्बन बिलाड़ा ने मस्तराम मोर और कबूतर कानाफूसिया को ‘जंगलद्रोह’ के आरोप में समन भेज दिया। 

तब से मोर और कबूतर यह साबित करने के लिए पुलिस स्टेशन के चक्कर लगा रहे हैं कि “सिस्टम की आलोचना करना, जंगलद्रोह नहीं होता . . .” 

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