अच्छाई की क़ीमत

01-06-2026

अच्छाई की क़ीमत

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ज़रूरी नहीं कि हर सज़ा 
किसी गुनाह के बदले ही मिले, 
कई बार
बेहद मासूम होना भी
ज़िन्दगी की अदालत में
सबसे बड़ा अपराध ठहर जाता है। 
 
जो लोग
हर किसी के लिए दिल खोल देते हैं, 
अक्सर वही
सबसे ज़्यादा ख़ाली रह जाते हैं। 
 
जो रिश्तों को
पूजा की तरह निभाते हैं, 
उन्हीं के हिस्से
सबसे ज़्यादा टूटन आती है। 
 
क्योंकि दुनिया
सिर्फ़ बुराई से नहीं डरती, 
उसे बहुत ज़्यादा अच्छाई से भी
घबराहट होती है। 
 
एक लड़का था
जो हर किसी की मदद करता था, 
लोगों के दर्द सुनता, 
अपनी ख़ुशियाँ बाँट देता, 
और अपने हिस्से के दुख
चुपचाप रातों में पी लिया करता था। 
 
उसे लगता था
कि अगर वह किसी का बुरा नहीं करेगा, 
तो दुनिया भी
उसके साथ नरमी बरतेगी। 
 
मगर उसने देर से जाना
दुनिया का हिसाब
दिल से नहीं, 
ज़रूरत से चलता है। 
 
जब तक वह
सबकी उम्मीदें ढोता रहा, 
सब उसे अपना कहते रहे, 
लेकिन जिस दिन
उसने अपने दर्द की बात की, 
लोगों ने धीरे-धीरे
उससे दूरी बना ली। 
 
क्योंकि
दुनिया को सहारा देने वाले लोग तो चाहिए, 
मगर टूटे हुए सहारे
किसी को पसंद नहीं आते। 
 
बहुत अच्छे लोग
अक्सर इस्तेमाल कर लिए जाते हैं। 
 
उनकी चुप्पी को
कमज़ोरी समझ लिया जाता है, 
उनकी विनम्रता को
मजबूरी, 
और उनके समर्पण को
आदत। 
 
फिर एक दिन
वही लोग
जिनके लिए उन्होंने
अपना सब कुछ दे दिया था, 
उन्हें यह कहकर छोड़ जाते हैं
तुम बहुत अच्छे हो . . . 
लेकिन . . . 
और यह लेकिन
किसी तलवार से कम नहीं होता। 
 
हद से ज़्यादा सच्चे लोग
झूठ की दुनिया में
अकेले पड़ जाते हैं। 
 
उन्हें छल करना नहीं आता, 
इसलिए वे
हर बार छल लिए जाते हैं। 
 
उन्हें नाराज़ होना नहीं आता, 
इसलिए लोग
उनकी सहनशीलता की सीमा भूल जाते हैं। 
 
उन्हें ना कहना नहीं आता, 
इसलिए हर कोई
उनके हिस्से का वक़्त, 
उनकी नींद, 
उनकी शान्ति
थोड़ा-थोड़ा चुरा लेता है। 
 
और वे
हर बार मुस्कुराकर कहते हैं
कोई बात नहीं . . . 
जबकि भीतर
बहुत कुछ टूट रहा होता है। 
 
सबसे ज़्यादा दर्द
उन्हें नहीं होता
जो बुरे होते हैं, 
बल्कि उन्हें होता है
जो हर हाल में अच्छा बने रहने की कोशिश करते हैं। 
 
क्योंकि बुरे लोग
उम्मीद नहीं रखते, 
लेकिन अच्छे लोग
हर रिश्ते में सच्चाई ढूँढ़ते हैं। 
 
और जब उन्हें
बदले में स्वार्थ मिलता है, 
तो उनका भरोसा
धीरे-धीरे मरने लगता है। 
 
एक समय के बाद
बहुत अच्छे लोग बदल जाते हैं। 
 
वे पहले जैसे नहीं रहते, 
अब वे
हर किसी पर तुरंत भरोसा नहीं करते, 
हर किसी के लिए
ख़ुद को नहीं मिटाते। 
 
वे सीख जाते हैं
कि हर बार
अपने हिस्से का सूरज बाँट देने से
ख़ुद की ज़िन्दगी में अँधेरा भर जाता है। 
 
वे समझ जाते हैं
कि इंसान को
अच्छा तो होना चाहिए, 
मगर इतना भी नहीं
कि लोग उसकी अच्छाई को
अपना अधिकार समझ लें। 
 
कभी-कभी
अपने लिए खड़ा होना भी
ज़रूरी होता है। 
 
हर किसी को ख़ुश रखते-रखते
अगर तुम ख़ुद रोने लगे हो, 
तो यह अच्छाई नहीं, 
अपने अस्तित्व के साथ अन्याय है। 
 
याद रखो
पेड़ जितना अधिक फल देता है, 
पत्थर भी उसी को सबसे ज़्यादा पड़ते हैं। 
 
नदी जितनी शांत होती है, 
लोग उतना ही
उसकी गहराई भूल जाते हैं। 
 
और इंसान जितना ज़्यादा सहनशील होता है, 
दुनिया उतना ही
उसे परखती चली जाती है। 
 
इसलिए
अपने भीतर की अच्छाई को बचाकर रखो, 
मगर उसके साथ
थोड़ी समझदारी भी जोड़ लो। 
 
हर किसी के लिए
ख़ुद को मत जलाओ, 
कुछ रोशनी
अपने हिस्से के लिए भी बचाकर रखो। 
 
क्योंकि
ज़रूरी नहीं कि दुख
सिर्फ़ ग़लतियों की वजह से मिले, 
कभी-कभी
हद से ज़्यादा अच्छे होने की भी
बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
काम की बात
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
सामाजिक आलेख
चिन्तन
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
लघुकथा
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में