छींके पर चढ़ा पकड़ा गया चोर: नाम है पनीर

15-01-2026

छींके पर चढ़ा पकड़ा गया चोर: नाम है पनीर

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जब से नेताओं ने सफ़ेद टोपी पहननी शुरू की है, तब से सफ़ेद यानी पवित्र—इस पर से भरोसा उठ गया है। 

मंत्री ने सेक्रेटरी को बुला कर पूछा, “बताओ, हमारे राज में कोई दुखी है क्या?” 

सेक्रेटरी गिड़गिड़ाते हुए बोला, “मंत्रीजी, अगर किसी ने ख़ुद को दुखी घोषित किया तो उसे फाँसी पर लटका देंगे। आपके राज में किसी को भी ख़ुद को दुखी कहने का हक़ नहीं है।” 

मंत्री ख़ुश होकर बोले, “अच्छा? तो फिर बताओ, जनता किस बात से सबसे ज़्यादा ख़ुश है?” 
सेक्रेटरी बोला, “मंत्रीजी, जनता इसलिए ख़ुश है क्योंकि पनीर उन्हें बेहद आसानी से मिल रहा है। पब्लिक जब देखो, तब पनीर के तरह-तरह के आइटम खा रही है और मौज कर रही है।” 

जनता की मौजमस्ती की बात मंत्रीजी को रास नहीं आई। उन्होंने कहा, “पब्लिक इतना सारा पनीर खा कैसे रही है? हमने तो पक्का इंतज़ाम कर रखा है कि जनता की आमदनी कम ही रहे, ताकि वह हमेशा हाँफती-घिसटती रहे। फिर भी सबको पनीर कैसे नसीब हो रहा है? हमें पनीर पर टैक्स बढ़ाना होगा।” 

सेक्रेटरी बोला, “मंत्रीजी, आप चाहे जितना टैक्स लगा दें, जनता सस्ते पनीर का जुगाड़ कर ही लेगी। क्योंकि सच तो यह है कि जो पनीर जनता खा रही है, वह असली पनीर है ही नहीं। वह तो केमिकल, एसिड, स्टार्च वग़ैरह अजीब-अजीब चीज़ों से बना एक सफ़ेद पदार्थ मात्र है। हमारे राज में इतना दूध पैदा ही नहीं होता, जितना पनीर खाया जाता है।” 

मंत्रीजी चौंके, “ओहो? क्या जनता इस सफ़ेद पनीर के काले कारोबार से अनजान है?” 

सेक्रेटरी ने हिम्मत करके कहा, “मंत्रीजी, जब से देश में नेता सफ़ेद टोपी पहनकर घूमने लगे हैं, तब से जनता का यह भरोसा ही उठ गया है कि सफ़ेद चीज़ें साफ़ और पवित्र होती हैं। पनीर तो खुलेआम पकड़ा गया चोर है।” 

मंत्रीजी दाँत पीसते हुए बोले, “क्या बात है, पब्लिक गंदा पानी पीकर मर जाए, कोई बात नहीं। लेकिन मिलावटी पनीर खाकर मर जाए तो वह इस ग़रीब देश की जनता के लिए ‘वैभवशाली मौत’ कहलाएगी। ऐसी वैभवशाली मौत हमारे देश को मंज़ूर नहीं।” 

सेक्रेटरी शान्ति से बोला, “मंत्रीजी, ये सारी बातें छोड़िए। पब्लिक को साफ़-सुथरी चीज़ों की आदत नहीं डालनी चाहिए। अगर जनता को साफ़ चीज़ों की आदत पड़ गई तो कल उठकर दूध, तेल जैसी हज़ार चीज़ें शुद्ध माँगने लगेगी। फिर ये भी कहेगी कि प्रदूषण घटाकर साफ़ हवा दो। और फिर इससे आगे बढ़कर कहेगी कि हमें एकदम साफ़-सुथरी, बेदाग़ सरकार भी दो . . . बताइए, यह सब क्या पच पाएगा?” 

मंत्रीजी चुप हो गए, जैसे गले में नक़ली पनीर का लोथड़ा अटक गया हो। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कविता
किशोर साहित्य कहानी
सामाजिक आलेख
चिन्तन
कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में