कॉकरोच कचवाटिया को ज़ोरदार थप्पड़
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
“इस तरह तो मेरा राजनीतिक जीवन शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा।” कॉकरोच कचवाटिया चिंता में था। लेटर बम का इस्तेमाल करके महाराजा सिंह समर्थक, भक्त शिरोमणि कार्यकर्ता भेड़ाभाई भाडफूसिया ने कॉकरोचों को डरा दिया था, इसलिए कॉकरोच कचवाटिया का आंदोलन सफल नहीं हो पाया। कॉकरोच समाज का राजनीतिक महत्त्व स्थापित करने निकले कॉकरोच कचवाटिया को पहली ही कोशिश में बड़ा झटका लगा। बड़े पैमाने पर स्प्रे किए जाने का डर दिखाया गया था, इसलिए कॉकरोच बाहर ही नहीं निकले।
कॉकरोच मूल रूप से डरपोक होते हैं, यह बात कॉकरोच कचवाटिया ख़ुद जानता था। वह स्वयं भी राजा सिंह के स्प्रे के डर से बिल में छिप गया था, लेकिन खरगोशभाई के बूस्टर डोज़ से बाहर निकलकर उसे विरोध करने की ताक़त मिली थी। कॉकरोच पार्टी बनाकर आंदोलन शुरू करने वाले अध्यक्ष कॉकरोच कचवाटिया ने उपाध्यक्ष काॅकरोच कखारी से कहा, “मुझे लगता है कि हमें सब कुछ छोड़ देना चाहिए। जैसा चल रहा है, चलने दो।”
“यही तो राजनीति है।” काॅकरोच कखारी ने कॉकरोच कचवाटिया से ज़्यादा दुनिया देखी थी, ज़्यादा स्प्रे झेले थे और उनसे बच निकलने की कला ने उसे साहसी बना दिया था। उसने हौसला बढ़ाते हुए कहा, “राजनीति में तो यह सब रोज़ होगा। पार्टी प्रमुख के रूप में आपको इन सब बातों को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनानी होगी। अगर राजा सिंह ‘कॉकरोच विनाश परियोजना’ चलाएगा, तो उसके मुक़ाबले आपको भी एक सुरक्षा बल बनाना पड़ेगा।”
“अब हमें क्या करना चाहिए?” कॉकरोच कचवाटिया चिंता में इधर-उधर दौड़ रहा था।
“पहले तो दौड़ना बंद कीजिए। शान्ति से बैठिए और दिमाग़ भी शांत रखिए,” कॉकरोच कखारी ने सलाह दी। “आप ऐसा वीडियो बनाइए जिससे कॉकरोचों को हिम्मत मिले और जंगल के अलग-अलग स्थानों पर आंदोलन की घोषणा कीजिए। डर के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा हथियार हिम्मत ही है।”
“लेकिन एक आंदोलन असफल हो गया, तो अब दूसरा सफल होगा इसकी क्या गारंटी है?” कॉकरोच पूरी तरह निराश हो चुका था। उसे मन ही मन लगा कि विदेशी जंगल में ‘वन रिलेशन’ की डिग्री लेकर कोई नौकरी कर ली होती तो बेहतर रहता।
“असफलता से मत डरिए। जिन कछुआभाई ककलाटिया को आप प्रेरणा मानते हैं, उन्होंने भी लगातार हंगामा और आंदोलन करके राजनीतिक महत्त्व स्थापित किया और मुख्यमंत्री बने। आंदोलन से ही वे आगे आए हैं। जंगल में वही नेता सफल हो सकता है, जो आंदोलन के ज़रिए अराजकता पैदा कर सके। आपकी राजनीति भी इसी से चमकेगी।”
कॉकरोच कखारी का लंबा भाषण सुनकर कॉकरोच कचवाटिया फिर से लड़ने के लिए तैयार हो गया।
वह नया वीडियो शूट करने की तैयारी कर ही रहा था कि कॉकरोच कखारी को कुछ याद आया। उसने एक और सलाह दी, “किसी भी समाज को उकसाने के लिए उसकी परंपराओं का सहारा लेना पड़ता है। आप बारबार कहिए कि इतनी महान परंपरा होने के बावजूद सदियों से कॉकरोचों के साथ अन्याय हुआ है। इससे उनमें समाज-प्रेम जागेगा। राजा सिंह ने भी पक्षियों के बीच विभाजन की राजनीति की थी और उसी से उनकी राजनीति चमकी थी।”
वैसे तो कॉकरोच कचवाटिया ‘वन रिलेशन’ का पढ़ा-लिखा था। उसे जनसंपर्क करना आता था। उसने बड़े जोश से वीडियो बनाया, “मेरे प्यारे कॉकरोचों, करोड़ों वर्षों से हम अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहे हैं। डायनासोर जैसे भयानक जीव भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए थे। लेकिन आज के जंगल में हमारे साथ भेदभाव हो रहा है। हमारे ख़िलाफ़ एक साज़िश चल रही है। हमारी परंपरा, हमारी विचारधारा और हमारा जीवन ख़तरे में है। पूरी तरह नष्ट होने से पहले जागो। आओ, सब मिलकर पूरे जंगल में आंदोलन करें।”
जंगल के अलग-अलग स्थानों पर, अलग-अलग दिनों में आंदोलनों की घोषणा की गई और संबंधित क्षेत्रों के कॉकरोचों से उसमें शामिल होने की अपील की गई। योजना के अनुसार कॉकरोच कचवाटिया ने एक-दो जगह आंदोलन भी किए। कहीं उसने हिट स्प्रे दिखाया, कहीं चॉक दिखाई, तो कहीं नीम की पत्तियों से बना तरल पदार्थ दिखाया। इन सब चीज़ों को दिखाकर उसने कॉकरोचों को ख़ूब डरा दिया।
अब कॉकरोच कचवाटिया को लगने लगा कि उसका समाज एकजुट हो रहा है। अगर बंदा इसी तरह आंदोलन जारी रखेंगे तो जंगल में उनका राजनीतिक महत्त्व स्थापित हो जाएगा।
एक दिन कॉकरोच कचवाटिया इसी तरह भाषण देकर मंच से नीचे उतरा। दूसरे कॉकरोचों ने उत्साह में उसे अपने कंधों पर उठा लिया। तभी एक मेंढक पास आया और उसने कॉकरोच को ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ इतना ज़ोरदार था कि कॉकरोच की आँखों के आगे कुछ देर के लिए अँधेरा छा गया। हिट स्प्रे से भी उतना असर नहीं होता था, जितना इस थप्पड़ से हो गया।
थप्पड़ मारने के बाद मेंढक बोला, “मैं राजा सिंह की ‘थप्पड़ोलॉजी’ से प्रभावित हूँ। राजा सिंह थप्पड़ को आशीर्वाद मानते हैं। मैंने भी इसी तरह कॉकरोच कचवाटिया को आशीर्वाद दिया है।”
जब ‘जंगल न्यूज़’ ने थप्पड़ मारने वाले मेंढक की कुंडली खंगाली, तो पता चला कि वह बगलाभाई की संस्कारी पाठशाला का छात्र रह चुका है। उसी पाठशाला में पहले राजा सिंह और रीछभाई भी पढ़ चुके हैं।
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