एकलव्य का अँगूठा
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
स्कूल यूनिफ़ॉर्म का मोज़ा पहनते ही पाँच में से तीन अंगुलियाँ बाहर आ गईं। विधवा माँ ने देखा तो उसकी समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए।
पर समझदारी तो उसने बेटे को बचपन में ही पिला दी थी। इसलिए दीनू यानी दिनेश ने कहा, “माँ आज स्टेट डिबेट में सेलेक्शन हो जाने दीजिए, फिर तो तुम्हारा यह बेटा फ़र्स्ट प्राइज़ जीत ही लाएगा। और इनाम की जो रक़म मिलेगी, उसमें मेरा मोज़ा तो क्या, देखना तुम्हारे लिए साड़ी भी ले आउँगा।”
किसी बीड़ी कंपनी के थैले जैसे प्लास्टिक बैग में कापी-किताबें ले कर दीनू स्कूल जाने के लिए निकल पड़ा। दीनू छोटा था, तब की एक बात माँ को याद आ गई। एक बार वह झोपड़ी के बाहर पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रहा था। तभी किसी बच्चे ने उससे पूछा, “दीनू ऐसा कौन-सा काम है, जो तू जीवन में एक बार ज़रूर करना चाहता है?”
नन्हे दीनू ने कहा था, “सुना है कि पेट भर खाने के बाद डकार आती है। मैं चाहता हूँ कि जीवन में एक बार मुझे भी डकार आए।”
उसी दिन से पेट काट कर बेटे को पढ़ा-लिखा कर सक्षम बनाने के लिए माँ मेहनत कर रही थी और दीनू भी पढ़ाई से ले कर हर प्रवृत्ति में सब से आगे था।
स्कूल पहुँच कर प्रार्थना से ले कर क्लास में भी वह शेखर मास्टर के आगे-पीछे रहने की कोशिश करता रहा। जब से उसे पता चला था कि बेस्ट स्पीकर के अवार्ड में 11हज़ार रुपए नक़द इनाम है, तब से स्टेट डिबेट कंपटीशन उसके लिए प्रतियोगिता नहीं लक्ष्य हो गया था।
शेखर मास्टर को ही नेशनल डिबेट कंपटीशन में भेजने के लिए विद्यार्थियों का सेलेक्शन करना था। पहला नाम था दीनू का था और दूसरा नाम था उनके घर पर्सनल ट्यूशन के लिए आने वाले संजय का। शेखर मास्टर ने एक झटके में एक नाम निकाल दिया और उस समय भी एकलव्य का अँगूठा कट गया।
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