वॉर पॉल्यूशन: युद्ध की राख में जलती पृथ्वी
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जब भी कोई युद्ध छिड़ता है,
तो केवल सीमाएँ नहीं काँपतीं,
धरती की साँसें भी हाँफने लगती हैं,
आकाश अपनी नीली चादर समेट
काले धुएँ में सिसकने लगता है।
तोपों की गर्जना में
मनुष्य अपनी विजय ढूँढ़ता है,
पर उसी क्षण
प्रकृति अपनी हार लिखती है
धीरे-धीरे, बिना शोर के।
किसी शहर में गिरती है एक मिसाइल,
और ख़बर बनती है,
इतने लोग मरे, इतने घायल हुए . . .
पर कोई नहीं लिखता,
कि उस एक धमाके में
कितनी हवाएँ ज़हर बन गईं,
कितने बादल काले पड़ गए,
और कितनी नदियाँ
अपने ही आँसू पी गईं।
वह धुआँ,
जो उठता है आकाश की ओर,
सिर्फ़ राख नहीं होता,
वह होता है
टूटे घरों का दर्द,
जले हुए खेतों की चीख़,
और उन पेड़ों की अंतिम साँस
जो कभी छाँव देते थे।
युद्ध में जलते हैं केवल शहर नहीं,
जलते हैं जंगल भी,
जहाँ पक्षियों के गीत
अचानक मौन हो जाते हैं,
जहाँ हिरणों की आँखों में
डर का सागर भर जाता है,
जहाँ जीवन
एक ही क्षण में
भस्म हो जाता है।
कोई नहीं गिनता
उन चिड़ियों की लाशें,
जो आसमान में ही गिर जाती हैं,
क्योंकि हवा अब हवा नहीं,
ज़हर बन चुकी होती है।
कोई नहीं पूछता
उन नदियों से,
जो युद्ध के बाद
काली पड़ जाती हैं,
जिनमें बहता पानी
अब जीवन नहीं,
मौत का संदेश लेकर चलता है।
जब रिफ़ाइनरियों में आग लगती है,
तो केवल तेल नहीं जलता,
धरती का भविष्य जलता है,
और वह धुआँ
बादलों में मिलकर
बरसता है,
एक काली बारिश बनकर।
वह बारिश
जो खेतों को नहीं सींचती,
बल्कि मिट्टी को बीमार कर देती है,
जो शरीर को नहीं भिगोती,
बल्कि त्वचा को जला देती है,
जो जीवन नहीं देती,
बल्कि धीरे-धीरे
मौत बोती है।
युद्ध के बाद
जब लोग अपने घर लौटते हैं,
तो पाते हैं,
कि घर तो फिर भी बनाए जा सकते हैं,
पर हवा?
उसे कैसे साफ़ करें?
पानी?
उसे कैसे फिर से पवित्र करें?
और वह आकाश,
जो अब नीला नहीं रहा,
उसे कौन रँगेगा?
युद्ध की असली क़ीमत
मृतकों की संख्या नहीं होती,
वह होती है
वह ज़हर
जो वर्षों तक
हमारी साँसों में घुला रहता है।
बीस साल . . .
कभी-कभी उससे भी ज़्यादा,
धरती अपने घाव भरती रहती है,
पर हर नया युद्ध
उसे फिर से घायल कर देता है।
मनुष्य अपनी जीत का जश्न मनाता है,
झंडे लहराता है,
पर उसे यह नहीं दिखता
कि उसी हवा में
वह ज़हर भी लहरा रहा है
जो उसकी आने वाली पीढ़ियों को
धीरे-धीरे ख़त्म कर देगा।
यह कैसी जीत है
जिसमें हार
हमारी पृथ्वी की होती है?
यह कैसी बहादुरी है
जिसमें कायरता छिपी है,
प्रकृति के प्रति,
जीवन के प्रति?
जब बम गिरता है,
तो वह केवल ज़मीन नहीं तोड़ता,
वह तोड़ता है
जलवायु का संतुलन,
वह बढ़ाता है
ग्रीनहाउस गैसों का बोझ,
जो धीरे-धीरे
पूरी दुनिया को
एक अदृश्य आग में झोंक देता है।
वह आग
जो दिखाई नहीं देती,
पर हर साल
गर्मी को बढ़ाती है,
हर साल
बर्फ़ को पिघलाती है,
हर साल
समुद्र को उफनाती है।
और तब
किसी दूर देश में
एक बच्चा पूछता है,
यह गर्मी इतनी क्यों बढ़ रही है?
कोई जवाब नहीं देता,
कि कहीं न कहीं
एक युद्ध चल रहा है।
कोई नहीं बताता,
कि उसकी मासूम साँसों में
किसी और देश के युद्ध का धुआँ है।
यह दुनिया
अब केवल देशों में नहीं बँटी,
यह बँटी है
ज़िम्मेदारियों और लापरवाहियों में।
कुछ देश
आँकड़े गिनते हैं,
कुछ देश
रणनीति बनाते हैं,
पर कोई नहीं गिनता
वह अदृश्य मौत
जो हवा में घुल रही है।
अगर एक दिन
सभी युद्ध रुक जाएँ,
तो शायद
धरती राहत की साँस ले,
आकाश फिर से नीला हो,
नदियाँ फिर से गुनगुनाएं।
पर जब तक
मनुष्य के भीतर
विजय की भूख
करुणा से बड़ी रहेगी,
तब तक
हर जीत
एक नई हार होगी,
पृथ्वी की,
प्रकृति की,
और अंततः
मानवता की।
युद्ध ख़त्म होते हैं,
पर उनका धुआँ
कभी ख़त्म नहीं होता।
वह रहता है,
हमारी साँसों में,
हमारे पानी में,
हमारी मिट्टी में,
और हमारी आने वाली पीढ़ियों की
क़िस्मत में।
इसलिए
जब अगली बार
कहीं कोई युद्ध छिड़े,
तो केवल यह मत पूछना,
कौन जीतेगा?
यह भी पूछना,
कितनी हवा हारेगी,
कितना पानी हारेगा,
कितनी धरती हारेगी . . .
और अंत में,
क्या हम सब
हार नहीं जाएँगे?
क्योंकि सच यही है,
युद्ध में कोई एक देश जीतता है,
पर हर बार
पृथ्वी हारती है।
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