नेताजी का संकल्प: ख़ुद को बेचूँगा और उस से भी विकास करवाऊँगा

01-07-2026

नेताजी का संकल्प: ख़ुद को बेचूँगा और उस से भी विकास करवाऊँगा

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कुछ सांसद बिक गए होने की जानकारी मिलने पर संशयात्मा ऐसे ही एक नेताजी से मिलने पहुँचा।

संशयात्मा ने कहा, “सुना हैं कि आप बिक गए हैं?”

“आपको मुझसे सवाल पूछने के बजाय मुझे बधाई देनी चाहिए कि वाह नेताजी, ‘आप बिक गए हैं, इसके लिए बधाई’।” नेताजी ने कहा।

संशयात्मा बोले, “हैं? आप तो शर्मिंदा होने के बजाय गर्व कर रहे हैं। शर्म करने के बजाय बधाई माँग रहे हैं?”

नेताजी बोले, “ये नया भारत है। अब जो सत्तारूढ़ दल में रहे, उसे गर्व ही करना चाहिए और जो राजनीति में रहकर भी विपक्ष में रहकर गधे जैसी मेहनत करे, उसे ही शर्म करनी चाहिए। देखिए, मैं बिका, इसका मतलब है कि मेरी कुछ क़ीमत लगी। इस तरह मैं देश का एक मूल्यवान नेता हूँ। जो लोग नहीं बिके, वे सारे नेता मुफ़्तिया हैं।”

संशयात्मा ने कहा, “फिर भी आपको ऐसा नहीं लगता कि आपने अपने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है?”

नेताजी ने कहा, “मतदाताओं के साथ विश्वासघात कैसे? चुनाव के समय मैंने मतदाताओं से विकास कार्यों का वादा किया था। अब दल बदलकर भी मैं विकास कार्य तो करूँगा ही। देखिए, इसके लिए मैंने एक योजना भी बना ली है।”

“लेकिन वह तो आप विपक्ष में रहकर भी सरकार पर दबाव डालकर करवा सकते थे,” संशयात्मा ने कहा।

नेताजी बोले, “अरे बुद्धू भगत, अब कोई ऐसी सरकार नहीं रही जो किसी के दबाव में आ जाए। न अमेरिका के, न चीन के, न इज़राइल के, और न ही अपने देश के जनप्रतिनिधियों के। आप ये सारी बातें छोड़िए। इसके बजाय मेरी योजना सुनिए। मैंने तय किया है कि एक जनप्रतिनिधि के रूप में बिक जाने के बदले मुझे जो रक़म मिली है, उसमें से कुछ राशि मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में बेंच, बस स्टैंड जैसे छोटे–बड़े कामों में लगाऊँगा।”

संशयात्मा ने कहा, “लेकिन उसके लिए तो आपको क्षेत्रीय विकास निधि मिलती है न?”

नेताजी बोले, “हाँ, लेकिन उसमें ख़ुद को बेचकर देश की जनता के लिए कुछ करने वाली भावना नहीं आती। सोचिए, भविष्य में किसी बेंच पर लिखा होगा, ‘राज्यसभा चुनाव के लिए बिके हुए फ़ंड से’, तो वह कितना यादगार बनेगा। किसी बस स्टैंड पर लिखा होगा, ‘हॉर्स ट्रेडिंग के हिस्से के रूप में प्राप्त योगदान से’। किसी सार्वजनिक शौचालय पर लिखा होगा, ‘दल-बदल करने के एवज़ में मिले पुरस्कार से’। अतीत में अनेक महापुरुष देश के लिए खप गए। आप समझ लीजिए कि हम देश के लिए ख़ुद को, अपनी अंतरात्मा को, सब कुछ बेच रहे हैं।”

संशयात्मा ने कहा, “आपकी योजना तो ज़बरदस्त है, लेकिन हमारे देश में सत्तारूढ़ दल के सांसद और विधायक कभी नहीं बिकते। बिकते तो केवल विपक्ष के सांसद और विधायक ही हैं। आपकी योजना के अनुसार यदि जनप्रतिनिधियों को ख़ुद को बेचकर विकास कार्य करने हैं, तो फिर विपक्ष को मज़बूत बनाना पड़ेगा। बड़ी संख्या में विपक्षी सांसद, विधायक और पार्षद चुने जाएँँगे, तभी तो वे भविष्य में बिककर ऐसा ‘यादगार’ विकास कर पाएँगे!”

नेताजी बोले, “सॉरी डियर, मुझे याद नहीं रहता, लेकिन मैं अब सत्तारूढ़ दल में हूँ। इसलिए मैं आपको या किसी और को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हूँ। अब आपको भी मुझसे कोई सवाल पूछने नहीं आना चाहिए। चलिए फिर, जय भारत . . . जय हिंद।”

(जनता भावनाओं में बहकर वोट देती है और नेता ‘भाव’/क़ीमत में बहकर बिक जाते हैं।)

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