कुशल शिल्पी

01-07-2026

कुशल शिल्पी

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

 

मोहन के पिता एक शिल्पकार थे। वह पत्थरों को सुंदर ढंग से तराशकर मूर्तियाँ बनाते थे। उनकी छैनी इतनी कुशलता से चलती कि कठोर पत्थर में भी सुंदर आकृतियाँ उभर आतीं।

मोहन बहुत शरारती और नटखट था, लेकिन उसके पिता उसे कभी डाँटते नहीं थे। वह हमेशा प्यार से समझाते थे। मोहन कुछ देर शांत रहता, फिर कोई नई शरारत कर बैठता।

मोहन अक़्सर अपने पिता के पास बैठकर उन्हें काम करते हुए देखा करता था। उसके पिता पत्थर का एक टुकड़ा लेते, उसे छैनी से तराशते और धीरे-धीरे एक सुंदर मूर्ति का रूप दे देते। कभी-कभी एक मूर्ति बनाने में कई दिन लग जाते, तो कभी कई महीने। लेकिन मोहन के पिता चंदूलाल कभी धैर्य नहीं खोते थे। वह अत्यंत शांत और धैर्यवान थे।

मोहन बड़े ध्यान से यह सब देखता था। उसे अपने पिता को काम करते देखना बहुत अच्छा लगता था।

एक दिन मोहन के पिता ने भगवान कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति बनाई। फिर उन्होंने उस पर रंग किए और उसे आकर्षक वस्त्रों से सजाया। मूर्ति इतनी जीवंत लग रही थीं मानो अभी बोल पड़ेगी या बाँसुरी बजाने लगेगी।

यह देखकर मोहन बहुत ख़ुश हुआ। अब उसकी शरारतें भी कुछ कम हो गई थीं। वह सोचने लगा कि उसके पिता कितने धैर्य से एक साधारण पत्थर को सुंदर मूर्ति में बदल देते हैं।

एक दिन उसके पिता ने पूछा, “बेटा, सामने जो पत्थर रखा हैं, उसकी क्या क़ीमत होगी?”

मोहन बोला, “पता नहीं, शायद पचास या सौ रुपए।”

पिता ने फिर पूछा, “और सामने जो मूर्ति रखी हैं, उसकी क्या क़ीमत होगी?”

मोहन ने कहा, “उसकी तो बहुत क़ीमत होगी। कम से कम पंद्रह सौ या दो हज़ार रुपए।”

पिता मुस्कुरा कर बोले, ”पत्थर तो वही है, फिर उसकी क़ीमत और मूर्ति की क़ीमत में इतना अंतर क्यों हैं?”

मोहन ने कहा, “क्योंकि आप उसे बहुत सुंदर बनाते हैं। रंग भरते हैं, सजाते हैं और उसे ऐसा रूप देते हैं कि लगता है भगवान अभी बोल पड़ेंगे।”

पिता ने पूछा, “मोहन, क्या तुम भी इस मूर्ति की तरह सुंदर बनना चाहते हो? मैं तुम्हें भी ऐसा बना सकता हूँ।”

मोहन चौंक कर बोला, “मुझे मूर्ति जैसा सुंदर बना देंगे? लेकिन कैसे? मूर्ति तो पत्थर से बनती है। मैं तो आपका बेटा हूँ, कोई पत्थर थोड़ी हूँ।”

पिता हँसते हुए बोले, “जैसे कुम्हार मिट्टी को आकार देता है, बढ़ई लकड़ी को तराशता है और शिल्पकार पत्थर को सुंदर रूप देता है, वैसे ही माता-पिता और गुरु बच्चों को अच्छे संस्कार देकर उनका व्यक्तित्व गढ़ते हैं। शुरूआत में हम मिट्टी, लकड़ी या पत्थर के समान होते हैं। फिर अच्छे गुरु और माता-पिता हमें सँवारते हैं।”

मोहन ने उत्सुकता से पूछा, “क्या वे भी हमें छैनी से तराशते हैं?”

पिता बोले, “नहीं बेटा। यह काम संस्कारों से होता है। माँ प्यार देती हैं, पिता मेहनती और साहसी बनना सिखाते हैं। गुरु ज्ञान देते हैं, ग़लतियाँ सुधारते हैं और जीवन की सही राह दिखाते हैं। यदि वे कभी डाँटते भी हैं, तो हमारे भले के लिए ही।”

मोहन ध्यान से सुनता रहा।

पिता आगे बोले, “माता-पिता और गुरु दया, करुणा, सेवा, धर्म और मानवता जैसे गुणों से मनुष्य रूपी मूर्ति का निर्माण करते हैं। फिर उसे शिक्षा और ज्ञान के रंगों से सजाते हैं। हमें पढ़ाई में मन लगाना चाहिए, धैर्य रखना चाहिए और एकाग्र होकर अपना काम करना चाहिए।”

मोहन ने कहा, “हाँ पिताजी, जब आप मूर्ति बनाते हैं, तब आप अपने काम में इतने खो जाते हैं कि आपको समय, भूख-प्यास या आसपास की कोई बात याद नहीं रहती।”

पिता बोले, “बिलकुल सही। जब भी कोई काम करो, पूरी लगन और ध्यान से करो। यदि मन भटकता रहेगा, तो मूर्ति अच्छी नहीं बनेगी। और ख़राब मूर्ति की क़ीमत भी कम होती है।”

मोहन ने सिर हिलाया, “हाँ पिताजी, आपकी बात बिलकुल सही है।”

तब पिता ने कहा, “हमें अपनी क़ीमत पहचाननी चाहिए। हमें अपने जीवन का शिल्पकार स्वयं बनना चाहिए। अपने जीवन को कैसा आकार देना है, यह हमें ही तय करना होता है। यदि हम अपने चरित्र और गुणों को सुंदर बनाएँगे, तो हमारा जीवन भी अमूल्य बन जाएगा।”

मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ पिताजी, मैं अभी छोटा हूँ, लेकिन आपकी बातें मुझे समझ में आ रही हैं। मैं इन्हें हमेशा याद रखूँगा। एक दिन मैं भी अपने जीवन का कुशल शिल्पी बनूँगा, बिलकुल आपकी तरह।”

अच्छे संस्कार, शिक्षा, धैर्य और मेहनत से व्यक्ति अपने जीवन को सुंदर और मूल्यवान बना सकता हैं। हर व्यक्ति अपने जीवन का शिल्पकार स्वयं होता हैं। 

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