तुमने शब्दों में
हथेलियाँ रख दीं,
मैंने अर्थ से पहले
मौन को पढ़ लिया।
क्योंकि जहाँ स्पर्श जन्म लेता है,
वहाँ विचार अनावश्यक हो जाते हैं,
चेतना स्वयं को
किसी परिभाषा में नहीं,
किसी कम्पन में प्रकट करती है।
तुम्हारे शब्द
भाषा नहीं थे,
वे देह की स्मृति थे,
वह स्मृति
जो अनुभव होने से पहले
सोची नहीं जाती।
जब मैंने पढ़ा,
मैं पाठक नहीं रहा,
मैं साक्षी बन गया,
अर्थ का नहीं,
होने का।
और सच यही है,
जहाँ अनुभव स्वीकार किया जाता है,
वहाँ भाषा
अपना भार उतार देती है,
और दर्शन
जीवन का स्वाभाविक श्वास बन जाता है।
वहाँ कोई उत्तर नहीं रहता,
केवल
सह-अस्तित्व।
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