कहा मैंने मुख से, किया आपने “हाँ जी, हाँ जी”—भला पिता जी, आपका उपकार कैसे भूलूँ?
वीरेन्द्र बहादुर सिंह21 जून: फ़ादर्स डे
उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, जब मुश्किलों का पहाड़ सामने खड़ा हो, तब दिल से एक ही आवाज़ निकलती है, “पापा हैं न।”
क्या आप कभी नाटक देखने गए हैं? नाटक में मंच पर दिखाई देने वाले कलाकारों को तो सभी देखते हैं, लेकिन उनके अभिनय के पीछे अनेक लोग काम करते हैं, निर्देशक, मेकअप आर्टिस्ट, मंच सजाने वाले, प्रकाश व्यवस्था करने वाले, संगीतकार आदि। इन लोगों को मंच पर मौजूद कलाकारों जितनी प्रसिद्धि नहीं मिलती, इसलिए इन्हें ‘अनसंग हीरो’ कहा जाता है। यदि जीवन एक रंगमंच है, तो हमारे जीवन के ऐसे ही ‘अनसंग हीरो’ हैं—पिता।
माँ का स्नेह बोलता है, लेकिन पिता की भावनाओं को अक्सर शब्द नहीं मिलते। बचपन में हमने पिता का कठोर रूप देखा होता है, पर यह नहीं जान पाते कि हमारे सो जाने के बाद वही कोमल हाथ कितनी देर तक हमारे सिर पर प्यार से फिरते रहते हैं। हमारी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने के लिए पिता अपनी नींद तक भूल जाते हैं।
बचपन में पिता का जो डर हमारे मन में होता है, वही जीवन के किसी मोड़ पर हमारी सबसे बड़ी हिम्मत बन जाता है। जैसे महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण को सारथी बनाकर अर्जुन निश्चिंत हो गए थे, वैसे ही हमारे जीवन के सारथी हमारे पिता होते हैं।
उम्र चाहे कितनी भी बढ़ जाए, जब कोई बड़ी परेशानी सामने आती है तो मन में एक आवाज़ उठती है, “पापा हैं न, सब ठीक हो जाएगा।” और सचमुच पिता सब कुछ ठीक कर देते हैं, वह भी इस तरह कि हमें पता तक नहीं चलता।
जीवन की तपती धूप में पेड़ की छाया की तरह होते हैं पिता। वे स्वयं धूप सहते हैं, ताकि हमें आराम मिल सके। जैसे शब्द-शब्द जोड़कर महान उपन्यास बनता है और ईंट-ईंट जोड़कर महल खड़ा होता है, वैसे ही पिता हर क्षण अपने बच्चों में परिपक्वता, साहस और दुनिया से लड़ने का जज़्बा गढ़ते रहते हैं।
माँ की तुलना में पिता अधिक डाँटते हैं, लेकिन उस डाँट में दूरदृष्टि छिपी होती है। उसका मीठा फल संतान को वर्षों बाद चखने को मिलता है। कोई व्यक्ति जीवन में कितनी भी ऊँचाई क्यों न प्राप्त कर ले, जब तक उसके पिता जीवित हैं, उसके भीतर का एक बच्चा जीवित रहता है। पिता के जाने के साथ वह बच्चा भी विदा हो जाता है और भीतर एक परिपक्व व्यक्ति का जन्म होता है।
माँ की महिमा पर कवियों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन पिता पर अपेक्षाकृत कम लिखा गया है। आइए, आज पिता को समर्पित कुछ चुनिंदा रचनाओं का आनंद लें।
“मैं था बहुत छोटा-सा बालक,
पिता ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया।
सदा अच्छे संस्कारों से रखा प्रसन्न,
भला पिता जी, आपका उपकार कैसे भूलूँ?
जब युवावस्था आई और मूँछों पर ताव दिया,
तब भी उन्होंने कभी मन में रंजिश नहीं आने दी।
मैंने जो कहा, उन्होंने “हाँ जी, हाँ जी” कहकर पूरा किया,
भला पिता जी, आपका उपकार कैसे भूलूँ?
मुझे देखकर अपार आनंद पाते थे,
मुँह से माँगी हर वस्तु लाकर दे देते थे।
यदि पुत्र भूल करे तो उसे समझाते थे,
और ग़लती होने पर दंड भी देते थे।
पर उस दंड में भी करुणा छिपी रहती थी,
स्नेह त्यागकर कभी पीड़ा नहीं दी।
भला पिता जी, आपका उपकार कैसे भूलूँ?
जिस पिता के कंधों पर हमने
अपनी चिंताओं और परेशानियों का बोझ रखकर
जीवन के लंबे रास्तों,
दुनिया की गलियों और मोड़ों में यात्रा की,
आज हम उसी पिता के शरीर को
अपने कंधों पर उठाकर ले आए हैं।
पुरानी सूखी लकड़ी जैसी एक गंध फैल उठी,
जब चरमराती हुई धूसर अलमारी खुली।
कोनों से टूटे हुए पीले काग़ज़,
पुरानी पुस्तकों में अब भी समय की साँसें लेते प्रतीत हुए।
मोरपंख का फीका पड़ चुका रंग,
किताबों के बीच दबा पीपल का पत्ता,
कुमकुम के सूखे कण,
और पन्नों पर पड़े हाथों के हल्के निशान
समय का लंबा पर्दा वर्तमान में प्रवेश कर गया
और क्षण भर में हरी-भरी स्मृतियों की दुनिया रच दी।
पत्थर जैसे बाहरी व्यक्तित्व के भीतर भी
भीगा हुआ, गर्माहट भरा मन होता है।
मेरे पापा तो मेरे जीवन का
चमकता हुआ उजाला हैं।
पिता हर किसी के जीवन का अनमोल आधार हैं,
उन्होंने कभी अपनी भावनाओं का हिसाब नहीं रखा।
आकाश की तरह खुले हुए,
कभी किसी पर ताला नहीं लगाते।
मेरे पापा मेरे जीवन का
चमकता हुआ उजाला हैं।
दीपक बनकर घर को रोशन करते हैं,
ग़लती होने पर उँगली पकड़कर सही राह दिखाते हैं।
उनका होना जीवन में उजास भर देता है,
मेरे पापा मेरे जीवन का चमकता हुआ उजाला हैं।
उनकी कठोर आँखों से सब काँप जाते हैं,
पर उनमें प्रेम का अथाह सागर छिपा रहता है।
वे साथ हों तो अँधेरे में भी
रास्ता साफ़ दिखाई देता है।
मेरे पापा मेरे जीवन का
चमकता हुआ उजाला हैं।”
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