शान्तिप्रिय साहित्यकारों का ठंडे दिल से युद्ध चिंतन

15-05-2026

शान्तिप्रिय साहित्यकारों का ठंडे दिल से युद्ध चिंतन

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जिसने अकादमी-परिषद का युद्ध देख लिया, उसके लिए बाक़ी दुनिया के युद्ध क्या मायने रखते हैं?

एक वृद्ध नवोदित लेखक ने अपनी शर्ट के किनारे से चश्मे के शीशे साफ़ करते हुए कहा, “सज्जनो, मुझे अचानक अहसास हुआ है कि हम पिछले कुछ दिनों से वर्तमान विश्व की एक बहुत बड़ी घटना पर चर्चा करना भूलते जा रहे हैं।”

एक सेल्फ़-स्टाइल्ड महान कवि ने आँखें सिकोड़ते हुए कहा, “अरे मेरे संवेदनशील मित्र, हमारी साहित्यकारों की परंपरा रही है। चाहे साहित्य हो या गोष्ठी, हम समकालीन विषयों को छूते ही नहीं। हम तो शाश्वत भावनाओं को शब्दों में पिरोकर आनंद लेते हैं।”

एक निबंधकार मुँह बनाकर बोला, “सही बात है। समकालीन विषयों को छेड़ते हैं तो कहीं किसी की नाराज़गी का सामना करना पड़ सकता है।”

वृद्ध नवोदित थोड़ा काँपते हुए बोला, “मेरे विद्वान साथियों, मैं युद्ध की बात कर रहा हूँ, युद्ध की।”

नवोदित ने जैसे ही यह कहा, मानो उसने ड्रोन छोड़ दिया हो, बाक़ी साहित्यकार घबरा उठे। एक युवा आलोचक ने तुरंत जेब से एसीटीडी की गोली निकाल ली और ठंडे स्वर में बोला, “वरिष्ठ मित्र, अब अकादमी और परिषद के बीच पहले जैसा भीषण युद्ध कहाँ होता है? जिसने वह युद्ध देख लिया, उसके सामने दुनिया के अन्य युद्ध क्या हैं?”

नवोदित ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “हे प्रियजन, मैं ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध की बात कर रहा हूँ। क्या इतनी बड़ी वैश्विक घटना के प्रति हम पूरी तरह उदासीन रह सकते हैं?”

सेल्फ़-स्टाइल्ड महान कवि ने खंखारते हुए कहा, “मुझे मूड आने दो, मैं कुछ वर्षों में आधा दर्जन युद्ध-काव्य रच दूँगा।”

एक कहानीकार ने आह भरते हुए कहा, “अमेरिका में हमारे साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए अच्छे मेज़बान मिल जाते हैं।” फिर थोड़ा संकोच करते हुए बोला, “वहाँ मेरी महिला पाठकों की संख्या भी काफ़ी है, लेकिन ईरान की ओर से अभी तक किसी ने मेरी फ़ेसबुक कहानी को लाईक नहीं किया है।”

निबंधकार थोड़ा हिचकते हुए बोला, “अगर कोई संस्था युद्ध विषय पर पुरस्कार घोषित करे, तो मैं भी युद्ध पर एक पुस्तक लिखने का विचार कर सकता हूँ।”

दूसरे उपन्यासकार ने घोषणा की, “चाय तो सड़क किनारे की दुकान पर पीते हैं, लेकिन कहानी फ़ाइव स्टार कॉफ़ी शॉप की लिखते हैं, यह मेरा तरीक़ा नहीं है। मैं यथार्थवादी वर्णन में विश्वास करता हूँ। मैं दुबई की स्थिति पर अगला उपन्यास लिखूँगा, बस वहाँ का कोई साहित्य-प्रेमी बिज़नेसमैन मेरी यात्रा प्रायोजित कर दे।”

अचानक उस आलोचक के मोबाइल पर एक संदेश आया। उसने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “लो, युद्ध के बुरे प्रभाव शुरू हो गए। कल एक पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम के बाद प्रीतिभोज तय था। अब प्रकाशक का संदेश आया है कि युद्ध के कारण केटरिंग वाले के पास गैस सिलेंडर नहीं है, इसलिए भोजन रद्द कर दिया गया है और केवल चाय-बिस्किट की व्यवस्था होगी।”

“प्रीतिभोज रद्द? ओह युद्ध की यह कैसी भयावह त्रासदी।” यह कहते हुए उस वृद्ध नवोदित ने सिर पकड़ लिया। 

सभी साहित्यकार एक-दूसरे को सांत्वना देने के परोपकार में व्यस्त हो गए। 

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