एक अधूरी बातचीत की कहानी

15-05-2026

एक अधूरी बातचीत की कहानी

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मान लो कि एक शाम हम मिले
और हमने हँस भी लिया, 
लेकिन इन आँखों के इस आसमान का क्या? 
खुली हुई इन आँखों और कोरी किताब को
फिर-फिर से कैसे पढ़ें? 
 
मान लो कि होंठ सहज ही मुस्कुरा उठे
और छाती में मेघधनुष फिर उग आए, 
लेकिन भीतर-भीतर बहती इस रेत का क्या? 
 
आँखों ने यूँ ही कुछ चूम लिया
और फूल ने पूछा कि कैसे हो? 
लेकिन मौन इस वेदना का क्या? 
 
मान लो कि हमने खा-पी लिया
और मान लो कि रात को थोड़ा जी भी लिया, 
लेकिन भीतर घुटते इस अकेलेपन का क्या? 
 
मान लो रानी तुम जीत गईं
और मान लो कि हवाएँ भी बीत गईं, 
लेकिन इस अधूरी कहानी का क्या? 

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