बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा

15-03-2026

बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

अब हर सुबह का पहला क़िस्सा दवाओं का डिब्बा है, 
जीवन की बची हुई साँसों का सहारा दवाओं का डिब्बा है। 
 
कल तक जो घर हँसी से भरता था आवाज़ों के मेले में, 
आज तन्हाई से बातें करता दवाओं का डिब्बा है। 
 
काँपते हाथों में यादों की धुँधली-सी गर्मी बाक़ी, 
वरना ठंडी रातों का साथी दवाओं का डिब्बा है। 
 
धड़कनों की चाल सँभाले बैठा चुपके से सिरहाने, 
वक़्त से चुराया थोड़ा लम्हा दवाओं का डिब्बा है। 
 
बेटे-बेटियाँ दूर शहर में अपने सपनों में खोए, 
माँ-बाबा की दिनचर्या का हिस्सा दवाओं का डिब्बा है। 
 
आईने में झुर्रियों ने जब उम्र का सच दोहराया, 
जीने की ज़िद को फिर समझाता दवाओं का डिब्बा है। 
 
‘वीरेंद्र’ दर्द लिखे तो काग़ज़ भी नम हो जाता है, 
शब्दों के साथ-साथ अब रोता दवाओं का डिब्बा है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
किशोर साहित्य कहानी
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सामाजिक आलेख
चिन्तन
कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में