कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
लखनऊ बस डिपो में मैं बरेली जाने वाली बस का इंतज़ार करते हुए खड़ा था। पीछे गठरिया लिए दो-चार ग्रामीण खड़े थे। मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि पीछे खड़े एक ग्रामीण ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, “ए लगरी आई . . . ए लगरी आई . . .”
यह सुनकर मैं सोच में पड़ कि यह भाई किसे ‘लगरी-लगरी’ कह रहा है? पलट कर देखा कि रोडवेज़ की पुरानी लग्ज़री बस रिवर्स में प्लैटफ़ॉर्म पर आ रही थी। तब समझ में आया कि ये ग्रामीण अपनी भाषा में लग्ज़री को ‘लगरी’ कहते हैं। लेकिन बस की हालत देखकर मैंने सोचा कि इसे लग्ज़री नहीं, लगरी ही कहना चाहिए।
बस का कंडक्टर रंगीन मिज़ाज का और गाने का शौक़ीन लग रहा था। रिवर्स में आती बस के ड्राइवर को प्लैटफ़ॉर्म का पता चले, इसलिए वह सीटी बजा रहा था, वह भी पूरे ताल में और साथ-साथ गा भी रहा था,
“आ जा सनम मधुर चाँदनी में हम,
तुम मिले तो वीरानी में भी आ जाएगी बहार . . .”
‘भस्मासुर’ नहीं, बल्कि ‘बस में सुर’ बिखेरता कंडक्टर गाते-गाते मेरे पास आया और टक . . . टक . . . टक करता हुआ टिकट काटने लगा। मैंने उससे पूछा, “भाई, तुम जो ‘चोरी चोरी’ फ़िल्म का गीत गा रहे हो, वह किसने लिखा है, जानते हो?”
जानकार कंडक्टर ने फ़ौरन जवाब दिया, “हाँ साहब, यह गीत हसरत जयपुरी ने लिखा है।”
मैंने फिर पूछा, “तुममें और हसरत जयपुरी में क्या समानता है, पता है?”
वह थोड़ा उलझ गया और सिर हिलाकर ना कह दिया। तब मैंने कहा, “भाई, क्या तुम्हें पता है? गीतकार बनने से पहले हसरत जयपुरी मुंबई की बेस्ट बस में कंडक्टर थे। जैसे तुम गाते-गाते टिकट काटते हो, वैसे ही वे नए-नए गीतों के मुखड़े गुनगुनाते और इस्तेमाल की हुई टिकटों के पीछे लिखते थे। कंडक्टर से ऐसे शीर्ष गीतकार बने।”
कंडक्टर बोला, “साहब, यह तो कमाल की बात है। हसरत जयपुरी साहब की कहानी सुनकर लगता है कि एक ज़माने में जो मेरी तरह सीटी बजाता था, वही एक दिन संगीत की दुनिया में डंका बजा गया।”
मैंने कहा, “दोस्त, तुम्हारी आवाज़ भी इतनी अच्छी है कि आज भले सीटी घंटी बजाते हो, लेकिन रियाज़ जारी रखोगे तो तुम भी एक दिन डंका बजाओगे।”
तारीफ़ से ख़ुश होकर उसने हसरत साहब का ही सटीक गीत छेड़ दिया—
“जिंदगी एक सफ़र है सुहाना,
यहाँ कल क्या हो किसने जाना . . .”
और गाता हुआ आगे बढ़ गया।
योग से मुझे मुंबई की बेस्ट बस में की गई एक यात्रा याद आ गई। मुंबई के मानसून में गड्ढों भरी सड़कों पर बस से सफ़र करना मानो ‘सफ़र-सफ़रिंग’ बन जाता है। सिंगल-डेकर बस में मैं ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठा था। दुबला-पतला ड्राइवर गड्ढों से बचाते हुए बस चलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था, फिर भी बस धड़धड़ाती हुई उछल रही थी।
टिकट देकर निपट चुके कंडक्टर की ओर देखकर ड्राइवर ने आह भरते हुए कहा, “खड्डों की वजह से तो पूरा बदन टूट जाता है . . . घर जाकर चम्पी करवाने का मन होता है . . .”
यह सुनते ही कंडक्टर गाने लगा-—
“मालिश . . . तेल मालिश . . .
सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए,
आ जा प्यारे, पास हमारे,
काहे घबराए, काहे घबराए . . .”
मैंने कंडक्टर से पूछा, “भाई, जो ‘तेल मालिश’ वाला गीत तुम गा रहे हो, परदे पर किसने गाया था, पता है?”
वह स्मार्ट था। बोला, “जॉनी वॉकर ने। मुझे पता है।”
मैंने फिर पूछा, “जॉनी वॉकर भी बेस्ट के कंडक्टर थे, यह जानते हो?”
कंडक्टर बोला, “क्या बात करते हैं! मैं तो उनका ज़बरदस्त फ़ैन, नहीं, टेबल-फ़ैन हूँ। आज भी मैं जॉनी वॉकर के कॉमेडी गीत गाता हूँ-
‘जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी,
अभी-अभी यहाँ था, किधर गया जी . . .’”
मैंने कंडक्टर से कहा, “जो महिलाएँ शरीर का ध्यान नहीं रखतीं और आकार खोकर निराकार हो जाती हैं, वे देर से जिम जाती हैं और फिर बड़े शीशे में ख़ुद को देखकर मन-ही-मन गुनगुनाती हैं—
‘जाने कहाँ मेरा फ़िगर गया जी,
अभी-अभी अच्छा था, बिगड़ गया जी . . .’”
कंडक्टर भी फ़िल्मों का शौक़ीन निकला। उसने कहा, “साउथ के सुपरस्टार शिवाजी राव गायकवाड़ भी बैंगलोर में कंडक्टर थे, आपको पता है?”
मैंने कहा, “भाई, मैंने साउथ के किसी शिवाजी राव गायकवाड़ नाम के सुपरस्टार का नाम नहीं सुना।”
यह सुनकर वह थोड़ा गर्व से बोला, “साहब, रजनीकांत का नाम नहीं सुना? वही हैं। रजनीकांत का असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है, अपने मराठी मानुष . . .”
यह सुनकर मैंने फिर वही बात दोहराई, “कंडक्टर बनकर सीटी बजाने वालों ने कलाकार बनकर दुनिया में डंका बजाया है।”
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