राजा सिंह की काम करने की पद्धति: ‘सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।’
वीरेन्द्र बहादुर सिंह.
जंगल में राजा सिंह ने नाम बदलने की भव्य परंपरा शुरू की थी। जंगल के नियमों से लेकर इमारतों तक के नाम बदले ही जा रहे थे, अब उन्होंने जंगल के क्षेत्रों के नाम बदलने की शुरूआत कर दी . . .
जंगल में जब बूढ़े सिंह का राज था, तब वर्तमान राजा सिंह उनका स्थान लेने के लिए उत्सुक थे। उस समय के राजा सिंह की तुलना में वर्तमान राजा सिंह युवा थे। उन्होंने जंगलवासियों से कहा, “मैं इस जंगल का राजा बनने के योग्य हूँ। मैं जंगल को नई ऊँचाइयों पर ले जाऊँगा। आप वर्षों से बूढ़े सिंह को राजा बना रहे हैं। मुझे एक मौक़ा दीजिए। मैं सिस्टम बदल दूँगा।”
बूढ़े सिंह को चुनाव में हराने के लिए उन्होंने नारा दिया, “नया वन, नया पर्यावरण, नया परिवर्तन।”
जंगलवासी नए परिवर्तन की बात से प्रभावित हो गए। उन्हें लगा कि जंगल में बदलाव की ज़रूरत है। बूढ़े सिंह में अब नवीनता नहीं रही और वे निर्णय लेने में कमज़ोर साबित हुए हैं। चुनाव में बूढ़े सिंह की भारी हार हुई और जंगलवासियों ने नए राजा को सत्ता सौंप दी।
बूढ़े सिंह के सिंहासन पर वर्तमान राजा सिंह विराजमान हुए। उन्होंने अपने निजी सलाहकार रीछराज को आंतरिक मामलों की ज़िम्मेदारी दी।
हाथीभाई को सड़क, परिवहन और रेल विभाग सौंपे गए। उन्होंने तुरंत कई योजनाएँ घोषित कर दीं। जैसे पहले जंगलवासी बैंकों में जाकर सामान्य तरीक़े से खाता खोल लेते थे। राजा सिंह ने वही प्रक्रिया रखी, लेकिन खाते का नाम दे दिया, “वन धन योजना।”
जंगल में सदियों से ऋतुएँ बदलती रहती थीं और जंगलवासी इसे सामान्य प्रक्रिया मानते थे। राजा सिंह ने एक योजना बनाकर उसका नाम रख दिया, “परिवर्तनशील पर्यावरण।”
ऐसे प्रभावशाली नाम देखकर जंगलवासी स्मार्ट राजा चुनने पर गर्व महसूस करने लगे।
धीरे-धीरे राजा सिंह को समझ में आया कि जंगल की सिस्टम बदलना चुनावी नारे देने जितना आसान नहीं है। सिस्टम बदलने के लिए ईमानदारी से काम करना पड़ता है, आलोचना सहनी पड़ती है, दरबार का ख़र्च कम करना पड़ता है, सादगी अपनानी पड़ती है और दिन-रात जंगल के हित में सोचना पड़ता है।
बहुत विचार करने के बाद राजा सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सिस्टम बदलने की ज़रूरत नहीं है। यदि नाम बदलने की परंपरा मज़बूत बना दी जाए तो समर्थक उसी को सिस्टम परिवर्तन मान लेंगे। सलाहकार रीछराज के साथ चर्चा के बाद उन्होंने सरकार की कार्यपद्धति बदल दी, “सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।”
इस योजना के तहत सबसे पहले उन्होंने जंगल का ‘काल’ बदल दिया। उन्होंने कहा, “अब तक जंगल मृतकाल में था, मैं उसे अमृतकाल में ले आया हूँ।”
सरकारी दस्तावेज़ों, बैनरों और विज्ञापनों में हर जगह ‘अमृतकाल’ लिख दिया गया। जंगलवासी अमृतकाल में प्रवेश कर ख़ुश हो गए।
एक दिन राजा सिंह ने घोषणा की, “अब जंगल के नियमों को नियम नहीं कहा जाएगा, उन्हें ‘दंडशास्त्र’ कहा जाएगा।”
जंगलवासियों ने इसे भी स्वीकार कर लिया। समर्थकों ने कहा कि इससे पूरी व्यवस्था बदल जाएगी।
फिर राजा सिंह ने घोषणा की, “सरकारी इमारतों को अब इमारत नहीं, ‘सेवालय’ कहा जाएगा।”
उन्होंने दरबारियों रीछराज, हाथीभाई और अधिकारियों बब्बन बिलाड़ा तथा मगर मारवाह को आदेश दिया, “अब हम सेवालय में बैठकर जो काम करेंगे उसे सेवा कहा जाएगा।”
समर्थक ख़ुशी से झूम उठे। उन्हें लगा कि जंगल में स्वर्णयुग आ गया है और ऐसा शासन वर्षों तक चलना चाहिए।
समर्थकों का उत्साह देखकर राजा सिंह भी उत्साहित हो गए। अब वे अक्सर बुदबुदाते, “नाम बदलने से ही सिस्टम बदल जाता है।”
इसके बाद उन्होंने जंगल के अलग-अलग क्षेत्रों के नाम बदलने शुरू कर दिए। उन्हें ख़ूब प्रसिद्धि मिली। उनके समर्थकों ने भी विरोधी नेताओं के नाम बदलने शुरू कर दिए। विपक्ष के नेता ख़रगोश, कछुआ, बारहसिंगा और वाघिन को ‘जंगलद्रोही’, ‘जंगलविरोधी’ जैसे नाम दिए जाने लगे।
एक दिन राजा सिंह को विचार आया, “मेरे मित्र गोल्डन ईगल का जंगल ‘समृद्ध वन’ कहलाता है और मेरे प्रतिद्वंद्वी राजा ड्रैगन अपने जंगल को समृद्ध बना रहे हैं। मुझे भी कुछ ऐसा करना चाहिए।”
उन्होंने अपने सलाहकार रीछराज से यह बात कही। रीछराज ज़ोर से हँस पड़े और बोले, “माफ़ कीजिए महाराज, आप अपनी विचारधारा से भटक गए हैं।”
राजा सिंह आश्चर्य से उन्हें देखते रहे। तब रीछराज ने कहा, “हमें तो सिर्फ़ नाम ही बदलना है, याद है?”
बात समझते ही राजा सिंह ने नया भाषण दिया, “अब हमारा जंगल ‘समृद्ध वन’ के नाम से जाना जाएगा।”
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
-
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- नेताओं पर ब्रांडेड जूते फेंके जाएँ, तभी प्रगति कहलाएगी
- पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह की काम करने की पद्धति: ‘सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।’
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो: विपक्ष के नेता खरगोशलाल का नया सूत्र
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर
- साल 3032 में शायद
- हमारी गारंटी, वर-कन्या समय पर स्टेज पर पधारेंगे . . .
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
- कविता
-
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मनुष्य
- माँ
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- शब्द
- शीशों का नगर
- सावधानी के बीच चूक
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
- किशोर साहित्य कहानी
- सामाजिक आलेख
-
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
- चिन्तन
- कहानी
- ऐतिहासिक
- ललित कला
- बाल साहित्य कहानी
- सांस्कृतिक आलेख
-
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
- लघुकथा
- काम की बात
- साहित्यिक आलेख
- सिनेमा और साहित्य
- स्वास्थ्य
- सिनेमा चर्चा
-
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
- पुस्तक चर्चा
- विडियो
-
- ऑडियो
-