जंगल की राजनीति में हाशिए पर धकेले गए कॉकरोच समाज की राजनीतिक अहमियत साबित करने की कोशिश
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
सिंह, भालू, तेंदुए, बाघ आदि अपनी ताक़त के कारण जंगल की सत्ता के केंद्र में रहते थे। लोमड़ी, बंदर, भेड़िए और गधों ने भी जंगल की राजनीति में ठीकठाक नाम कमाया था। भेड़, बैल, साँड़ और कुत्तों जैसे जीवों ने संख्या बल के कारण जंगलशाही में अपनी अहमियत साबित की थी। मछलियाँ और मगरमच्छ मुख्यधारा से जुड़ चुके थे और छोटे-बड़े चुनाव लड़कर राजनीति में सक्रिय हो गए थे। पक्षी उड़ते-फिरते रहते थे। एक जगह स्थिर रहकर संख्या बल दिखाने की उनमें जागरूकता नहीं थी, इसलिए अब तक उनका कोई राजनीतिक महत्त्व नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे कौवों, कबूतरों, उल्लुओं और चिड़ियों में राजनीतिक जागरूकता आई, इसलिए उन्हें भी राजनीतिक लाभ मिलने लगे।
जंगल में सरीसृपों की भारी उपेक्षा होती थी। साँप और छिपकली समाज के साथ सदियों तक अन्याय हुआ था, लेकिन राजा सिंह की कल्याणकारी योजनाओं के कारण साँप मुख्यधारा में शामिल होने लगे थे। साँपों के लिए ‘ज़हर दान शिविर’ जैसी योजनाएँ राजा सिंह ने शुरू की थीं। जो साँप ज़हर दान करते थे, उन्हें सरकार बिल बनाने में सहायता देती थी। साँपों के इस ज़हर का उपयोग चुनावों में होता था और जंगल की राजनीति में नेताओं को ज़हर उगलने की ज़रूरत पड़ती रहती थी, इसलिए इसकी माँग भी लगातार बढ़ती जा रही थी।
इन सबके बीच कीट-पतंगों की कोई गिनती ही नहीं होती थी। चींटियों को छोड़कर किसी भी कीट समाज को कभी उचित सम्मान नहीं मिला। चींटियों की सफलता की कहानियाँ सुनाई जाती थीं। उनके प्रबंधन की तारीफ़ होती थी। मच्छरों और मक्खियों की छवि तो पहले से ही ख़राब थी। यही स्थिति कॉकरोचों की भी थी। मच्छरों और मक्खियों की तरह गंदगी में रहने की आदत के कारण आम जंगलवासी की नज़र में कॉकरोचों के लिए कोई आदर नहीं था।
दरअसल, मच्छरों और मक्खियों की तरह कॉकरोचों का सफ़ाया करने को प्रोत्साहित किया जाता था। यह कहकर कि ये जीव जंगलवासियों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, जंगल की स्थानीय सरकारें इनके विनाश के लिए बाक़ायदा बजट आवंटित करती थीं। कॉकरोच के लिए तो ‘काॅकरोच विनाश परियोजना’ चलाकर उनके सामूहिक सफ़ाए हेतु स्प्रे बनाने वाली कंपनियों को सरकार विशेष ऋण देती थी। कॉकरोचों के प्रति जंगलवासियों की इस नफ़रत के पीछे मादाएँ विशेष रूप से ज़िम्मेदार थीं। जंगल की मादाओं को कॉकरोचों से बहुत चिढ़ थी। इसका कारण न तो वे ख़ुद जानती थीं और न ही किसी ने उन्हें बताया था, लेकिन परंपरागत रूप से उन्हें कॉकरोचों से नफ़रत थी। और चूँकि राजनीति मादाओं के वोट पाने के इर्द-गिर्द घूमती थी, इसलिए जंगल की सरकारें कॉकरोचों की पूरी तरह उपेक्षा करती थीं।
सदियों से जंगल में यही चलता रहा, लेकिन एक कॉकरोच के मन में विचार आया कि हमें इस स्थिति से बाहर निकलकर चींटियों की तरह अपनी राजनीतिक अहमियत साबित करनी चाहिए। उस कॉकरोच का बचपन असंतोष, चिढ़, खीझ और नाराज़गी में बीता था। उसने ख़ुद शपथपत्र बनवाकर अपना नाम कॉकरोच कचूमर रख लिया था। वह पूरे कॉकरोच समाज में परिवर्तन लाना चाहता था। राजनीतिक महत्त्व साबित करने की इच्छा से उसने मुख्यमंत्री कछुआभाई ककलाटिया की पार्टी के लिए काम किया। उसे लगा कि नाम के अनुसार कछुआभाई में भी ककलाहट के गुण हैं, इसलिए वे कॉकरोच समाज की बात समझेंगे, लेकिन कछुआभाई तो ऊँचे स्तर के राजनीतिक खिलाड़ी थे। उन्होंने कॉकरोच कचूमर को चुनाव के समय सोशल मीडिया प्रचार की ज़िम्मेदारी सौंप दी और उससे रात-रात भर काम करवाया। कॉकरोच की आँखों का नंबर तक बढ़ गया। उसका स्क्रीन टाइम इतना बढ़ गया कि आँखें सूजकर लाल हो गईं।
और चुनाव ख़त्म होने के बाद कछुआभाई ककलाटिया ने हल्के अंदाज़ में कॉकरोच कचूमर से कहा, “देख दोस्त, तुझे विदेशी जंगल में जाकर वीआर सीखना चाहिए।”
“वीआर मतलब?” कॉकरोच कचूमर ने पूछा।
“वन रिलेशन। तू उसका कोर्स कर ले, फिर मैं तुझे चुनाव में टिकट दूँगा। तुझे समझ में आएगा कि जंगलवासियों के साथ सम्बन्ध बनाए रखने के लिए कैसी-कैसी तरकीबें अपनानी पड़ती हैं,” कछुआभाई ने सलाह दी।
कछुआभाई की सिफ़ारिश के बाद लंबी यात्रा करके कॉकरोच विदेशी जंगल पहुँच गया। वहाँ वीआर का कोर्स चल रहा था। उसी दौरान उसकी मुलाक़ात दो हाथ और चार पैरों से बड़ी-बड़ी दीवारें चढ़ने वाले भँवरे भुजबल से हुई। भँवरे ने उसे ज़िन्दगी भर याद रहने वाली सलाह दी:
“दूसरों के भरोसे मत रह। तू ख़ुद कुछ कर। जो काम तू कछुआभाई ककलाटिया के लिए करता है, वही काम अपने लिए कर, अपने समाज के लिए कर।”
उस पल कॉकरोच कचूमर के दिमाग़ के सारे बंद दरवाज़े अचानक खुल गए। उसने मन ही मन संकल्प लिया, “मैं ख़ुद अपने समाज के लिए कुछ करूँगा। जंगल में मेरे समाज की चर्चा हो जाए, ऐसा करके दिखाऊँगा।”
और अचानक एक दिन कॉकरोच कचूमर ने समाज के हित के लिए “कॉकरोच पार्टी” बना दी। उसने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली:
“मेरे कॉकरोचो, हमें लड़ना है। हमें अपनी राजनीतिक अहमियत साबित करनी है।”
बस फिर क्या था, पूरा जंगल ‘कॉकरोच पार्टी’ की चर्चा से गूँज उठा। जो काम अब तक कभी नहीं हुआ था, वह कुछ ही घंटों में हो गया। जंगल का पूरा कॉकरोच समाज एकजुट हो गया।
कॉकरोच समाज की एकता देखकर राजा सिंह ने दरबारियों की आपात बैठक बुलाकर ‘काॅकरोच विनाश परियोजना’ का बजट दोगुना कर दिया।
यह ख़बर सुनने के बाद से कॉकरोच कचवाटिया जंगल में दिखाई नहीं दिया।
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