कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख

15-09-2026

कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हर चीज़ रखना नहीं, होता सदा विवेक। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥
 
कुछ रिश्ते पीड़ा बनें, कुछ देते अवसाद। 
जिनसे मन घायल रहे, क्यों ढोएँ वो याद॥
जिससे मन हो टूटता, क्यों रखना वह साथ। 
बीती बातें छोड़कर, थामो अपना हाथ॥
मुक्त हृदय जब हो सके, जीवन हो अभिषेक। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥
  
कुछ उम्मीदें बोझ हैं, कुछ सपनों की पीर। 
जिनके पीछे खो गया, मन का सारा धीर॥
व्यर्थ प्रतीक्षा छोड़कर, चुन लो नई राह। 
सूनी राहों के परे, खिलती है नव चाह॥
जिससे शान्ति मिल सके, खींचो ऐसी रेख। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥
  
कुछ दुख ऐसे भी मिले, जिनका नहीं निदान। 
बार-बार जो तोड़ते, उन पर मत दो ध्यान॥
बीते कल का बोझ क्यों, ढोना जीवन भार। 
पीड़ा अब खुलकर बहे, खुलने दो मन द्वार॥
घावों को सहला सके, ऐसा लिख दो लेख। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥
  
हर खोना नुक़्सान नहीं, हर पाना सुखदाय। 
कुछ चीज़ें छूटें तभी, जीवन आगे जाय॥
जिसको थामे टूटते, उसको कहे विराम। 
छोड़ देना भी कभी, होता हित का काम॥
नई दिशा में चल पड़े, मन का दीपक देख। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥
 
स्वयं बचाना भी कहा, जीवन का है धर्म। 
मन की शान्ति से बड़ा, क्या जग में हैं कर्म॥
जिससे जीवन बोझ हो, उससे रहना दूर। 
मुक्त हृदय से जी सको, जीवन हो भरपूर॥
अपनी राह स्वयं चुनो, यही विजय है नेक। 
कुछ बंधन से मुक्त हो, अपने मन को देख॥

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