माँ और प्रकृति

15-11-2025

माँ और प्रकृति

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 288, नवम्बर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

माँ हर सुबह निकलती है, 
आसमान के रंग संग। 
एक बोझा लकड़ी का सपना, 
एक विश्वास—जीवन का ढंग। 
 
पगडंडियाँ पहचानती हैं उसके पाँव, 
झरनों की भाषा समझती है। 
वो जंगल से माँगती नहीं कुछ, 
बस सूखी टहनी चुनती है। 
 
पहाड़ लाँघती है सहज भाव से, 
मानो धरती उसकी सहेली हो। 
थकान नहीं, करुणा चलती, 
उसके क़दमों की रेली हो। 
 
मैं पूछता हूँ—“माँ, क्यों इतना श्रम?” 
वो मुस्कुराती, कहती नम्र स्वर में—
“जंगल छानती हूँ, 
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए। 
कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़!” 
 
उस क्षण लगा—
माँ ही तो धरती है, 
जो जलती भी है, 
पर जीवन बचाती भी है। 

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