प्रेम ही विस्तार है

01-03-2026

प्रेम ही विस्तार है

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

यही सच्चा त्योहार है। 
मानवता से प्यार है॥
 
यही हमारा धर्म है, 
यही धर्म का सार है। 
 
न द्वेष मन में पालिए, 
प्रेम ही उपकार है। 
 
सब जीवों में एक सा, 
बसता सच्चा प्यार है। 
 
नफ़रत से न कुछ मिला, 
प्रेम ही विस्तार है। 
 
दुख हर लेता प्रेम ही, 
जीवन का आधार है। 
 
हाथ बढ़ाकर थाम लो, 
यही सच्चा व्यवहार है। 
 
मानवता की राह पर, 
चलना ही उद्धार है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
सामाजिक आलेख
नज़्म
दोहे
बाल साहित्य कविता
कहानी
ऐतिहासिक
हास्य-व्यंग्य कविता
लघुकथा
ललित निबन्ध
साहित्यिक आलेख
सांस्कृतिक आलेख
किशोर साहित्य कविता
काम की बात
पर्यटन
चिन्तन
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में

लेखक की पुस्तकें