गधों पर दाँव

15-04-2026

गधों पर दाँव

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

गधों पर दाँव लगाओगे तो रेस क्या जीतोगे, 
ऐसी चोट खाओगे कि चलना भी भूल जाओगे। 
 
झूठों के साथ रहोगे तो सच कहाँ पाओगे, 
आईना जब दिखेगा, नज़रें भी चुरा जाओगे। 
 
भीड़ के संग चलोगे तो ख़ुद को कहाँ पाओगे, 
राह अपनी न चुनी तो मंज़िल भी गँवा जाओगे। 
 
अहंकार की आग में ख़ुद को ही जलाओगे, 
राख बनकर एक दिन, पछताते रह जाओगे। 
 
सच्चे रिश्ते छोड़कर मतलब में उलझ जाओगे, 
वक़्त जब बदलेगा तो तनहा ही रह जाओगे। 
 
मेहनत से जो भागे, क्या मुक़ाम पाओगे, 
ख़्वाब अधूरे रहेंगे, यूँ ही सोते रह जाओगे। 
 
क़ाबिलों को छोड़कर ना-क़ाबिल अपनाओगे, 
डूबती उस नाव में ख़ुद भी उतर जाओगे। 
 
‘मन’ की बात न सुनोगे तो सुकून कहाँ पाओगे, 
ज़िंदगी के मोड़ पर बस भटकते रह जाओगे। 

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