हम आदमी, तुम लोग हो गए

01-01-2026

हम आदमी, तुम लोग हो गए

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

सबको बनाकर मैं बना कुछ कम बना तो क्या हुआ, 
सबको मिटाकर तुम बने ज़्यादा बने तो क्या हुआ। 
 
मेहनत मेरी मिट्टी हुई, तुमने उसी पर ताज रखा, 
मैंने पसीना बहा दिया, तुमने उसे ही राज रखा। 
 
कल का हिसाब किताब जब समय स्वयं लिखेगा, 
पूछेगा किसने क्या रचा, किसने क्या सिर्फ़ छीना। 
 
जो बचा गया मनुष्यता, वही तो असली जीत है, 
राजमहल हो या खंडहर, अंत में सब मीत है। 
 
मैं हारकर भी सीख लूँ, तुम जीतकर भी खो गए, 
फ़र्क़ बस इतना-सा रहा—हम आदमी, तुम लोग हो गए। 
 
नाम तुम्हारे शोर बने, काम मेरे संस्कार बने, 
भीड़ तुम्हारे साथ चली, सच मेरे हथियार बने। 
 
अंत समय जब आईना, सबको सच दिखलाएगा, 
कम होकर भी जो मनुष्य रहा, वही बड़ा कहलाएगा। 
 
 (डॉ. रमाकांत शर्मा जी की दो पंक्तियों से प्रेरित) 

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