बूँद-बूँद में सीख

01-04-2025

बूँद-बूँद में सीख

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

इस धरती पर हैं बहुत, पानी के भंडार। 
पीने को फिर भी नहीं, बहुत बड़ी है मार॥
 
जल से जीवन है जुड़ा, बूँद-बूँद में सीख। 
नहीं बचा तो मानिये, मच जाएगी चीख॥
 
अगर बचानी ज़िन्दगी, करें आज संकल्प। 
जल का जग में है नहीं, कोई और विकल्प॥
 
धूप नहीं, छाया नहीं, सूखे जल भंडार। 
साँसें गिरवी हो गईं, हवा बिके बाज़ार॥
 
आये दिन होता यहाँ, पानी ख़र्च फ़ुज़ूल। 
बंद साँस को ख़ुद करें, बहुत बड़ी है भूल॥
 
जो भी मानव ख़ुद कभी, करता जल का ह्रास। 
अपने हाथों आप ही, तोड़े जीवन आस। 
 
हत्या से बढ़कर हुई, व्यर्थ गिरी जल बूँद। 
बिन पानी के कल हमीं, आँखें ना ले मूँद॥
 
नदियाँ सब करती रहें, हरा-भरा संसार। 
होगा ऐसा ही तभी, जल से हो जब प्यार॥
 
पानी से ही चहकते, घर-आँगन-खलिहान। 
धरती लगती है सदा, हमको स्वर्ग समान॥
 
बाग़, बग़ीचे, खेत हों, घर या सभी उद्योग। 
जीव-जंतु या देव को, जल बिन कैसा भोग॥

पानी है तो पास है, सब कुछ तेरे पास। 
धन-दौलत से कब भला, मिट पाएगी प्यास॥
 
जल से धरती है बची, जल से है आकाश। 
जल से ही जीवन जुड़ा, सबका है विश्वास॥
 
अगर बचानी ज़िन्दगी, करें आज संकल्प। 
जल का जग में है नहीं, कोई और विकल्प॥

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