आईना दिखाने का अपराध

15-01-2026

आईना दिखाने का अपराध

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मेरी ख़ामियों का शहर में ढिंढोरा पीटा गया, 
जैसे उनके गुनाहों ने कभी जन्म ही न लिया हो। 
मेरे हर सच को साज़िश का नाम दे दिया गया, 
और उनके हर झूठ को दस्तूर बना लिया गया हो। 
 
यहाँ आईने टूटते हैं, सवाल ज़िंदा रहते हैं, 
हर चेहरा पाक है, बस नीयत गंदी है। 
मेरी एक चूक पर फ़ैसला सुना दिया जाता है, 
उनकी सौ भूलों पर ख़ामोशी की चादर तनी है। 
 
यह दौर गवाही नहीं, भीड़ का यक़ीन माँगता है, 
सच आज भी अकेला है, झूठ के साथ जमात है। 
जो झुककर चला, वही कमज़ोर ठहराया गया, 
और जो कुचल दिया गया, वही यहाँ हालात है। 
 
मैंने तो बस आईना दिखाने की ज़ुर्रत की थी, 
इसलिए मेरा नाम ही गुनहगार लिख दिया गया। 
सुकरात की तरह मैं भी बस इतना कह सका—
यह मुल्क नहीं बदला, 
बस सच बोलना मुश्किल कर दिया गया। 

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