हे प्रिये! 

15-02-2026

हे प्रिये! 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हे प्रिये! 
प्रेम कितना सुंदर है 
इसमें मृत्यु भी दुःख नहीं देती
काँटे फूल बन जाते हैं 
और शैतान भगवान बन जाते हैं। 
 
हे प्रिये! 
प्रेम वो मरहम है 
जो बड़े से बड़े घाव को भर देता है 
शत्रु को दोस्त बना देता है। 
 
हे प्रिये! 
प्रेम ने पत्थर को पिघलाकर 
पानी बना दिया 
टूटी-फूटी झोपड़ियों में 
महलों का सुख भर दिया। 
 
हे प्रिये! 
प्रेम कड़ी धूप में मीठी छाँव है 
अनजानेपन में भी अपनापन है 
हर मर्ज़ की दवा प्रेम है। 

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