बादल हैं पर बूँद नहीं

01-07-2026

बादल हैं पर बूँद नहीं

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल। 
प्यासे मन की देह पर, सूखा हर इक ताल॥
 
धरा तड़पती देखिए, फटते जाएँ खेत। 
आशा के अंकुर सभी, माँग रहे हैं मेघ॥
आँखों में बरसात हैं, सूना नभ का भाल—
बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥
 
वादों वाले मेघ हैंं, देते केवल शोर। 
बरसे एक बूँद भी नहीं, सूखे गाँव-छोर॥
झूठी बातें ओढ़कर, चलते रोज़ दलाल—
बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥
 
रिश्तों के आकाश में, छाए काले मेघ। 
प्रेम न बरसा एक भी, बढ़ते रहे विद्वेष॥
मन की बंजर भूमि पर, उगते केवल जाल—
बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥
 
सपनों के आकाश में, उड़ते रहे ख़्याल। 
मेहनत फिर भी ढूँढ़तीं, ख़ुशियों का मधुमास॥
आशा का दीपक जले, टूटे हर जंजाल—
बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥
 
‘सौरभ’ केवल बोल से, कब बदलें हालात। 
बरसें कर्मों की घंटा, तब महकें जज़्बात॥
सेवा, प्रेम, विश्वास से, भर जाएँ हर थाल—
बादल हैं पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

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